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बुधवार, 16 अगस्त 2017

एक गीत :--------तो क्या हो गया

                एक गीत : --------तो क्या हो गया

तेरी खुशियों में शामिल सभी लोग हैं ,एक मैं ही न शामिल तो क्या हो  गया !

ज़िन्दगी थी गुज़रनी ,गुज़र ही गई
बाक़ी जो भी बची है ,गुज़र जाएगी
दो क़दम साथ देकर चली छोड़ कर
ज़िन्दगी अब न जाने किधर जाएगी 
तेरी यादों का मुझको सहारा बहुत ,एक तू ही न हासिल तो क्या हो गया !

किसको मिलती हैँ खुशियाँ यहाँ उम्र भर
कौन है जो मुहब्बत  में  रोया नहीं 
मंज़िलें भी मिलीं तो उसी को मिलीं
आज तक राह में जो है सोया नहीं
चार दिन की मिली थी मुझे भी ख़ुशी,अब है टूटा हुआ दिल तो क्या हो गया !

एक   ढूँढे,   मिलेंगे    हज़ारों   तुझे
चाहने वालों की  यूँ  कमी तो नहीं
कैसे समझी कि कल मैं बदल जाऊंगा
प्यार मेरा कोई मौसमी तो नहीं
तेरी नज़रों में क़ाबिल सभी लोग हैं ,एक मैं  ही न क़ाबिल तो क्या हो गया

मैने तुझ से कभी कुछ कहा ही नहीं
बात क्या हो गई  तू ख़फ़ा हो गई
बेरुखी ये तिरी और मुँह फेरना 
कुछ बता तो सही क्या ख़ता हो गई

किसकी कश्ती है डूबी नहीं प्यार में,छू सका मैं  न साहिल ,तो क्या हो गया
तेरी खुशियों में शामिल सभी लोग हैं,एक मैं ही न शामिल तो क्या हो  गया

-आनन्द.पाठक-


 

शनिवार, 12 अगस्त 2017

एक ग़ज़ल : जो चढ़ रहा था वो सुरूर था----

एक ग़ज़ल : वो जो चढ़ रहा था----

वो जो चढ़ रहा था सुरूर था ,जो उतर रहा है ख़ुमार है
वो नवीद थी तेरे आने की , तेरे जाने की ये पुकार है

इधर आते आते रुके क़दम ,मेरा सर खुशी से है झुक गया
ये ज़रूर तेरा है आस्ताँ ,ये ज़रूर तेरा दयार है

न ख़ता हुई ,न सज़ा मिली , न मज़ा मिला कभी इश्क़ का
भला ये भी है कोई ज़िन्दगी ,न ही गुल यहाँ ,न ही ख़ार है

मेरी बेखुदी का ये हाल है ,दिल-ए-नातवाँ का पता नहीं
कि वो किस मकाँ का मक़ीन है , कि वो किस हसीं पे निसार है

ये जुनूँ नहीं तो है और क्या . तुझे आह ! इतनी समझ नहीं
ये लिबास है किसी और का ,ये लिबास तन का उधार है

ये ही आग ’आनन’-ए-बावफ़ा ,तेरी आशिक़ी की ही देन है
तेरी सांस है ,तेरी आस है , तेरी ज़िन्दगी की बहार है

-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ
नवीद = आने की शुभ सूचना
दिल-ए-नातवाँ = दुखी दिल
मक़ीन = निवासी/मकान मे रहने वाला

रविवार, 6 अगस्त 2017

Now that you pamper the soulful me

Now that you pamper  the soulful me  
Why won't  you pamper the bodily me 

You are the  he and I am the  she 
Why won't you love the she in me 

I am the nectar that feeds your soul 
Why won't you be my honey bee 

The fire, desires in the ember me 
Why won't you be my inferno spree 

The touch that renaissance the bodily me 

Why won't you be Leonardo da Vinci 

बुधवार, 26 जुलाई 2017

रूप तुम्हारा खिला कंवल है (गीत )

गीत 
रूप तुम्हारा खिला कँवल है 
हिरनी जैसी चाल है
मन्द मन्द मुस्कान तुम्हारी
मुख पर लगा गुलाल है
नैनों से नैना टकराये
दिल में मचा धमाल है
रूप तुम्हारा खिला कँवल है
हिरनी जैसी चाल है

बोल तुम्हारे मिश्री जैसे
मुखड़ा कोमल लाल है
अंग अंग कुंदन सा दमके
लगा सोलवाँ साल है
रूप तुम्हारा खिला कँवल है
हिरनी जैसी चाल है

खूब बरसते बादल आकर
मनवा अब बेहाल है
मधुरस टपके अधरों से जब
लगता बहुत कमाल है
रूप तुम्हारा खिला कँवल है
हिरनी जैसी चाल है
रूप तुम्हारा खिला कँवल है
हिरनी जैसी चाल है


संजय कुमार गिरि
गीत 
रूप तुम्हारा खिला कँवल है 
हिरनी जैसी चाल है
मन्द मन्द मुस्कान तुम्हारी
मुख पर लगा गुलाल है
नैनों से नैना टकराये
दिल में मचा धमाल है
रूप तुम्हारा खिला कँवल है
हिरनी जैसी चाल है

बोल तुम्हारे मिश्री जैसे
मुखड़ा कोमल लाल है
अंग अंग कुंदन सा दमके
लगा सोलवाँ साल है
रूप तुम्हारा खिला कँवल है
हिरनी जैसी चाल है

खूब बरसते बादल आकर
मनवा अब बेहाल है
मधुरस टपके अधरों से जब
लगता बहुत कमाल है
रूप तुम्हारा खिला कँवल है
हिरनी जैसी चाल है
रूप तुम्हारा खिला कँवल है
हिरनी जैसी चाल है


संजय कुमार गिरि

 

सोमवार, 24 जुलाई 2017

Laxmirangam: इस गली में आना छोड़ दो

Laxmirangam: इस गली में आना छोड़ दो:                                 इस गली में आना छोड़ दो                             रे चाँद ,                  हर रात , इस गली...

सोमवार, 17 जुलाई 2017

एक ग़ज़ल : दिल न रोशन हुआ----

एक ग़ज़ल :  दिल न रोशन हुआ-----

दिल न रोशन हुआ ,लौ लगी भी नही, फिर इबादत का ये सिलसिला किस लिए
फिर ये चन्दन ,ये टीका,जबीं पे निशां और  तस्बीह  माला  लिया किस लिए 

सब को मालूम है तेरे घर का पता ,हो कि पण्डित पुजारी ,मुअल्लिम कोई
तू मिला ही नहीं लापता आज तक ,ढूँढने का अलग ही मज़ा  किस लिए   

निकहत-ए-ज़ुल्फ़ जाने कहाँ तक गईं ,लोग आने लगे बदगुमां हो इधर
यार मेरा अभी तक तो आया नहीं ,दिल है राह-ए-वफ़ा में खड़ा  किस लिए       

तिश्नगी सब की होती है इक सा सनम,क्या शज़र ,क्या बसर,क्या है धरती चमन 
प्यास ही जब नहीं बुझ सकी आजतक,फिर ये ज़ुल्फ़ों की काली घटा किस लिए 

बज़्म में सब तुम्हारे रहे आशना .  एक मैं ही रहा  अजनबी की तरह
वक़्त-ए-रुखसत निगाहें क्यों नम हो गईं,फिर वो दस्त-ए-दुआ था उठा किस लिए 

माल-ओ-ज़र ,कुछ अना, कुछ किया कजरवी, जाल तुमने बुना क़ैद भी ख़ुद रहा
फिर रिहाई का क्यूँ अब तलबगार है  ,दाम-ए हिर्स-ओ-हवस था बुना किस लिए   

तुम में ’आनन’ यही बस बुरी बात है ,प्यार से जो मिला तुम उसी के हुए
कुछ भी देखा नहीं ,क्या सही क्या ग़लत, प्यार में फिर ये  धोखा मिला किस लिए  

-आनन्द.पाठक-
08800927181

शब्दार्थ
तस्बीह = जप माला
मुअल्लिम= अध्यापक
निकहत-ए-ज़ुल्फ़= बालों की महक
तिशनगी  = प्यास
वक़्त-ए-रुखसत = जुदाई के समय
माल-ओ-ज़र  = धन सम्पति
अना = अहम
कजरवी =अत्याचार अनीति जुल्म
दाम-ए-हिर्स-ओ-हवस  = लोभ लालच लिप्सा के जाल