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बुधवार, 21 सितंबर 2016

एक ग़ज़ल : निक़ाब-ए-रुख में....

ग़ज़ल : निक़ाब-ए-रुख में...


निक़ाब-ए-रुख में शरमाना, निगाहों का झुकाना क्या
ख़बर हो जाती है दिल को, दबे पाँवों  से आना क्या

अगर हो रूह में ख़ुशबू  तो ख़ुद ही फैल जाएगी
ज़माने से छुपाना क्या  ,तह-ए-दिल में  दबाना  क्या

अगर दिल से नहीं मिलता है दिल तो बात क्या होगी
दिखाने के लिए फिर हाथ का मिलना मिलाना क्या

क़यामत आती है दर पर ,झिझक कर लौट जाती है
तुम्हारा इस तरह चुपके से आना और जाना क्या

ख़ुदा कुछ तो अता कर दे मेरे मासूम दिलबर को
नहीं वो जानता होती वफ़ा क्या और निभाना क्या

तुम्हारी शोखियाँ क़ातिल अदाएं और भी क़ातिल
निगाह-ए-नाज़ की खंज़र से अब ख़ुद को बचाना क्या

क़सम खा कर भी न आना ,नहीं शिकवा गिला कोई
न आना था तो न आते ,ये झूटी कसमें खाना क्या

तुम्हारे इश्क़ ने मुझको कहीं का भी नहीं छोड़ा
हुआ है जाँ-ब-लब ’आनन’, तेरा आना न आना क्या

शब्दार्थ
ज़ाँ-ब-लब = मरणासन्न


-आनन्द.पाठक-
08800927181

रविवार, 18 सितंबर 2016

एक व्यंग्य : बे-हाल पच्चीसी कथा 1

एक व्यंग्य : बे-हाल पच्चीसी -कथा 1

[आप ने ’बेताल-पच्चीसी’ की कहानियाँ ज़रूर पढ़ी होंगी जिसमें राजा विक्रमादित्य जंगल से एक बेताल को डाल से उतार कर,अपने कंधे पर लाद कर ले चलते हैं और बेताल रास्ते भर एक कहानी सुनाते रहता है ।बेताल शर्त रखता है कि अगर राजा विक्र्मादित्य ने रास्ते कुछ बोला तो वह उड़ कर फिर डाल पर जा कर उल्टा लटक जाएगा .....

,वैसे यह सभी कहानियाँ ’यू-ट्यूब’ पर उपलब्ध है.........

अब आगे पढिए उसी ’बेताल-पच्चीसी’ की ’बे-हाल पच्चीसी"-कहानियाँ -------......]
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’विक्रू ! तू आ गया ?? मुझे मालूम था कि तू ज़रूर आएगा "-- जंगल में डाल पे उलटा लटके हुए बेताल ने कहा-" अरे विक्रू ! जिस साधु की बात में आ कर तू मुझे यहाँ लेने आया है वह साधु ’ढोंगी’ है --तू नहीं समझेगा।’
राजा विक्रमादित्य ने आश्चर्य से उस बेताल को देखा और सोचा कि कल तक तो यह बेताल राजा विक्र्मादित्य महाराज विक्रमादित्य राजन ..राजन..कहता रहता था आज इसे क्या हो गया है आज ’विक्रू...विक्रू कर रहा है? सच है किसी को 2-4-10 बार कंधे का सहारा दे तो सर चढ़ जाता है ..हो सकता है प्यार से ’विक्रू ...विक्रू ’कर रहा हो जैसे आजकल की लड़कियां दो दिन में ही अपने ’ब्वाय फ़्रेन्ड’ विभूति नारायण सिन्हा को संक्षेप मे .विभू’...विभू ...सुखदेव परसाद चौरसिया को सुख्खू...सुख्खू..करती फिरती रहती है..मैं तो फिर भी इसे सदियों से ढो रहा हूं~

राजा विक्रमादित्य ,बेताल को डाल से उतार कर चलने लगे ,,..
’विक्रू;-बेताल ने कहा--- रास्ता लम्बा है तू थक जायेगा .चल मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ..
राजन चुप रहे
’तो सुन ’
राजन चुप रहे
....प्राचीन काल में इन्द्रपस्थ नगरी में ’केसरी खाल’ नाम का एक नेता हुआ करता था जो हमेशा ’ केसरी’ [सिंह] की’ ’खाल’ ओढ़े हुए रहता था। । वह अपने आप को ईमानदार की प्रतिमूर्ति समझता था और अपने को छोड़ , वह सारी दुनिया को चोर ..बेईमान.. भ्रष्टाचारी ...घूसखोर..कामचोर ....ठुल्ला समझता था ।उसे लगता था कि वह राजा ’हरिश्चन्द्र ’ का कलियुगी अवतार है और अब वह सभी भ्रष्टाचारियों ...घूसखोरों और ’ठुल्लों’ को जेल भेज कर ही दम लेगा । यह बात और है कि वह किसी को जेल न भेज सका मगर किसी केसरी की तरह दहाड़ता खूब था। ईमान प्रशासन की स्थापना हेतु हर बात पर धरना देने लगा एक बार तो वह अपने ही शासन के विरुद्ध ही धरना देने बैठ गया था।अब वह हर मंच से भ्रष्टाचार के विरुद्ध दहाड़ने लगा और जनता सचमुच उसे -’केसरी’ समझने लगी ।
’विक्रू ! तू जानता है वह नेता भी एक बूढ़े बाबा को अपने कंधे पर लाद कर शहर शहर घूमता था । बाबा ने भी मेरे जैसा ही एक शर्त रखा था कि हे केसरी! अगर तूने कोई पार्टी बनाई तो मैं उड़ कर अपने आश्रम चला जाऊँगा
बाबा उड़ कर अपने आश्रम चले गए....
राजन विक्रमादित्य चुप रहे..
’...हाँ तो मैं क्या कह रहा था ....हाँ वह नेता अपनी जनता का बहुत ख़याल रखता था और जनता को मुफ़्त में पानी -बिजली देने की बात करता रहता था ।कभी कभी जनता के ऊपर बोझ पड़ा कर्ज भी माफ़ करने की भी बात करता था ।वोट लेने के लिए ,गरीबों के सामने पूँजीपतियों को गालियाँ देता था और अमीरों से चन्दा लेने के लिए अमीरों के साथ पंच सितारा होटलों में ’डिनर’ करने हेतु ’टिकट बेचता था । वह रामराज्य लाने के बातें करने लगा ...सपने दिखाने लगा..जनता उसकी इन हितकारी बातों से बड़ी प्रभावित हुई कि सदियों बाद कोई नेता ,जनता का इतना हितैषी मिला है । हाय ऐसा नेता पहले क्यों नहीं पैदा हुआ .कितने अभागे थे हम । जनता ने बड़े उत्साह से प्रचंड बहुमत से उसे ’इन्द्रप्रस्थ का सिंहासन’ सौप दिया ।
अब वह नेता से राजा हो गया
उसके शासनकाल में भ्रष्टाचार खत्म हो गया...सभी घूसखोर..कामचोर झुण्ड के झुण्ड जेल जाने लगे .साथ निभाने के लिए साथ में कुछ मंत्री भी जेल जाने लगे । जनता को अब मुफ़्त में पानी मिलने लगा...मुफ़्त में बिजली मिलने लगी ...मुफ़्त में दवाईयाँ मिलने लगी...स्कूलों में फ़ीस माफ़ हो गए...जो काम पिछली सरकारों ने 20 साल में नहीं किया उसने 2 साल में कर दिया --बड़े बड़े ’होर्डिंग लगाए जाने लगे ..आंकड़े दिखाए जाने लगे ...टी0वी-विज्ञापन आने लगे पर हरे भरे खेत,,,..मुस्कराता हुआ किसान . हर हाथ को काम ..कुछ लोग सी0डी0 बनाने के काम में लग गए...-राज्य प्रगति-पथ पर निकल पड़ा अत: उसके सारे मंत्री राज्य से बाहर यात्रा पर निकल पड़े.....जनता मगन ...मच्छर मगन ...डेंगू मगन ... चिकनगुनिया मगन ..
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"तो हे विक्रू ! अब तू मेरे सवाल का जवाब दे कि इस के बाद भी जनता त्राहिमाम त्राहिमाम क्यों कर रही थी ....बता बता ..तू तो बड़ा ज्ञानी है..तू तो न्याय करता है.... बड़ा न्यायी बने फिरता है ,,,
राजा विक्रमादित्य चुप रहे
;बता कि जनता त्राहिमाम क्यों कर रही थी ,...जवाब दे नहीं तो तेरे सर के टुकड़े टुकड़े कर दूँगा....
राजन सहम गए ..इस बेताल का क्या भरोसा ...कही सचमुच सर के टुकड़े ही न कर दे । अत: बोल उठे
"हे बेताल ! तो सुन ! जनता भोली थी ..नेता की बातों में आ गई और भरोसा कर प्रचण्ड बहुमत दे दिया शायद जनता को पता न था

इतना जल्दी किसी पे भरोसा न कर
जरा देर की जान-पहचान में

-तो फिर? -बेताल ने पूछा
-अब जनता को 5-साल का इन्तज़ार करना पड़ेगा
-हे विक्रू ! तूने एक ग़लती कर दी....तूने शर्त तोड़ दिया ,,,तू बोल उठा....यह ले... मैं चला उड़ कर.. अपने डाल पर
और हाँ जाते जाते एक बात और सुन ले----”ज़िन्दा क़ौमें 5-साल इन्तज़ार नहीं करती’

अस्तु

-----अथ श्री ’-बेहाल पच्चीसी’-कथायाम प्रथमोsध्याय



-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 17 सितंबर 2016

Chand Maahiya :quist 34

चन्द माहिया : क़िस्त 34
:1:
पूछा तो कभी होता
दिल से जो मेरे
ये, किस के लिए रोता ?

:2:
सोने भी नहीं देतीं
यादें अब तेरी
रोने भी नहीं देतीं

:3:
क्यों मन से हारे हो ?
जीते जी मर कर
अब किस के सहारे हो?

:4:
ग़ैरों की सुना करते
मेरी कब सुनते
जो तुम से गिला करते

:5:
मुश्किल की पहल आए
सब्र न खो देना
इक राह निकल आए


-आनन्द पाठक


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शनिवार, 10 सितंबर 2016

एक लघु व्यथा : प्यासा कौआ [रिटर्न]

एक लघु व्यथा : प्यासा कौआ [रिटर्न]

[नोट : आप ने बचपन में ’ प्यासा कौआ’ की कहानी ज़रूर पढ़ी होगी अब पढ़िए उसी कहानी का ’सिक्वल’---’प्यासा कौआ [रिटर्न]


प्यास से व्याकुल कौए ने घडा देखा .घडे में पानी था तो ज़रूर परन्तु पेंदी में था , मुँह से बहुत नीचे था .प्यास बुझाने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था .कौआ प्यास से हाल-बेहाल था .अचानक उसके मन में एक विचार कौंधा .फिर क्या था ! पास पड़े कंकडों को एक-एक कर के घडे में डालना शुरू किया.उसका यह सत्प्रयास रंग लाने लगा और घडे का जलस्तरधीरे-धीरे ऊपर उठने लगा.उसका यह परिश्रम सफल होने जा रहा था.वह सोच रहा था कि अब वह अपनी प्यास बुझा लेगा ....वह अब अपनी प्यास...

दूर कहीं केहुनी पर टिका,गांधी टोपी लगाए एक आदमी यह घटनाक्रम बड़े ध्यान व मनोयोग से देख रहा था और कौए के श्रम पर मंद-मंद मुस्करा रहा था.कौए ने जैसे ही जल पीने के लिए अपनी चोंच डुबाई कि उस आदमी ने एक पत्थर उठा कर चला दिया और कौए को भगा दिया .कौआ उड़ गया
.तत्पश्चात वह व्यक्ति बड़े आराम से पानी पीने लगा.लोग कहते हैं कि वह अपने क्षेत्र का बाहुबली था.

उस व्यक्ति की यह विलक्षण प्रतिभा व अद्भुत कार्यशैली देख कर आलाकमान महोदय अति प्रसन्न व प्रभावित हुए. उन्होंने उस व्यक्ति में अपने राजनैतिक उत्तराधिकारी के गुण देखते हुए आगामी चुनाव का टिकट दे दिया .कहने की आवश्यकता नहीं कि वह भारी  मतों से विजयी भी हो गया .
और कौआ?
वह कौआ आज भी डाल पर बैठ कर धूमिल जी की कविता गुनगुना रहा है :-

" एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है ,न खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ
यह तीसरा आदमी कौन है
मेरे देश की संसद मौन है?


इति श्री काक व्रत कथायाम द्वितीयोध्याय
अस्तु.

-आनन्द पाठक- गुड़गाँव
08800927181

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

अरविन्द केजरीवाल की नई राजनीति
‘आप’ के एक विधायक ने अरविन्द केजरीवाल को पत्र लिख कर कहा है कि उन्हें लोगों को बताना चाहिए की हमारा[ अर्थात आम आदमी पार्टी का] विश्वास है की हम राजनीति को बदल देंगे.
आज से लगभग २५०० वर्ष पहले प्लेटो ने कहा था की जब तक दार्शनिक राजा नहीं बनते या वह जिन्हें हम राजा मानते हैं दार्शनिक नहीं बन जाते तब तक प्रजा की मुसीबतों का अंत नहीं हो सकता. प्लेटो के समय से लेकर आज तक कोई विरला ही देश होगा जहां कोई दार्शनिक राजा बना होगा. राजनीति सदा से सत्ता का खेल रही है और रहेगी. जो लोग यह समझते है की वह राजनीति को बदलने के लिए राजनीति में आये हैं वह सिर्फ एक भ्रम पाल रहे होते हैं. राजनीति सदा एक जैसी होती है बस उसका दिखावा अलग-अलग हो सकता है.
एक समय था जब गद्दी पाने के लिए एक व्यक्ति हज़ारों लोगों का लहू बहा देता था. औरंगजेब ने तो अपने सभी भाइयों को मार डाला, अपने पिता को भी कैदी बना लिया था. आज भी ग़रीब ही मरता है. करोड़ों रूपए एक विधायक के चुनाव पर खर्च हो जाते हैं, इसका बोझ तो आम आदमी ही उठाता है. केजरीवाल सरकार ने अपना प्रचार करने के लिए दिल्ली सरकार के जो पैसे खर्च किये वह कहाँ से आये? लोगों ने टैक्स भरा तभी वह अपनी छवि सुधारने के लिए इतना व्यय कर पाए. अधिकतर यह वह लोग हैं जो दो वक्त की रोटी पाने के लिये और अपना परिवार पालने के लिए हर दिन १२  से १५ घंटे परिश्रम  करते हैं. ऐसा कठोर परिश्रम उन्हें जीवनभर करना पड़ता है.
फिर चुनावों में जो हिंसा होती है उसमें भी तो गरीब ही मरता है. न कोई राजनेता मरता है न ही कोई अभिजात्य वर्ग का व्यक्ति.
क्या बदल सकते हैं केजरीवाल? क्या वह अपने को बदल पाए हैं? क्या अपने अन्य नेताओं को बदल पाए हैं? क्या उन में इतनी समझ आ गई है कि आन्दोलन चलाना एक बात होती है और सरकार चलाना अलग बात? ऐसा लगता तो नहीं है.
जब वह अपने को नहीं बदल पाए तो राजनीति कैसे बदलेंगे?  अरविन्द केजरीवाल को समझना होगा कि सत्ता की अपनी जिम्मेवारियां होती हैं जिन्हें समझ और विवेक के साथ निभाना पड़ता है. जिस राजनेता के मन में सत्ता जिम्मेवारी का अहसास उपजा नहीं पाती वह राजनेता कभी भी समाज या संस्थाओं को सही ढंग से नहीं बदल पायेगा.
अगर सत्ता में बैठे लोग संस्थाओं का, नियम कानून का, परम्पराओं का सम्मान नहीं करते तो धीरे-धीरे समाज का भी इन संस्थाओं और नियमों से विश्वास उठ जाता है. समाज और संस्थाओं के बदलने के लिए असीम समझ और धैर्य की आवश्यकता होती है क्योंकि किसी भी ढांचे को एक पल में गिरा देना सरल होता है पर उसके पुनर्निर्माण धीरे-धीरे ही हो पाता है .
सत्ता किस तरह एक राजनेता को जिम्मेवार और व्यवहारिक बना देती है इसका उत्कृष्ट उदहारण लिंकन है. अपनी इन्हीं खूबियों के बल पर वह, दास प्रथा समाप्त कर, अमरीका में एक ऐतिहासिक  परिवर्तन ला पाए.

कभी-कभी लगता है कि दिल्ली वालों ने इतनी बड़ी जीत देकर ‘आप’ के साथ अन्याय ही किया है. ‘आप’ के नेताओं को लगने लगा है की नई दिल्ली के सिंहासन तक पहुंचना बहुत ही सरल है इस कारण सब थोड़ा उतावले हो रहे हैं. पर इस देश की राजनीति २०-२० का क्रिकेट मैच नहीं है. उतावलापन हानिकारक हो सकता है ‘आप’ के लिए. अगर ‘आप’ के नेता अपने को बदल लेंगे तो राजनीति स्वयं ही बदल जायेगी.

रविवार, 4 सितंबर 2016

रजनी ‘रजक’ विभूषण सम्मान- 2016 से सम्मानित

भिलाई इस्पात संयंत्र के निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व विभाग में कार्यरत श्रीमती रजनी रजक को अखिल भारतीय रजक समाज द्वारा दिल्ली में आयोजित सम्मान समारोह में ‘रजक’ विभूषण सम्मान - 2016 से सम्मानित किया गया। छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध लोक गायिका श्रीमती रजनी ने अपनी मंचीय प्रस्तुति वर्ष 1980 से प्रारंभ की। 1980 से 1984 तक मंचीय प्रस्तुति के साथ आकाशवाणी रायपुर की नियमित गायिका के रूप में लोक गीतों की प्रस्तुति देने लगी। इनकी कला प्रतिभा को देखते हुए वर्ष 1985 में भिलाई इस्पात संयंत्र ने एक कलाकार के रूप में सेवा करने का अवसर प्रदान किया। भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा लोककला सम्मान, लोकगाथा गायिका सम्मान, बिलासा महोत्सव बिलासपुर में बिलासा सम्मान, कला साहित्य की पत्रिका वसुंधरा द्वारा कला सृजन सम्मान, भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा आयोजित 32 वें छत्तीसगढ़ लोककला महोत्सव में दाऊ महासिंग चन्द्राकर सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।
श्रीमती रजनी रजक लोकगीत एवं लोकगाथा के गायन विधा में पारंगत है। उन्हें लोकगीत, लोक नृत्य, लोक गाथा कथा गायन, लेखन प्रलेखन एवं रंग मंचीय संचालन का लगभग 30 वर्षों से वृहद् अनुभव है। इसके अलावा वे बेहतर तरीके से मंच संचालन का भी अपना दायित्व बखूबी निभा रही हैं।

सोमवार, 22 अगस्त 2016

क्यों नहीं जीत पाये हम ओलंपिक स्वर्ण पदक
फिर एक बार अंतर्राष्ट्रीय खेलों में हमारा प्रदर्शन निराशाजनक रहा. एक रजत और एक कांस्य पदक पाकर भारत ने ओलंपिक पदक तालिका में ६७ स्थान पाया है.
हर बार की भांति इस मुद्दे पर खूब बहस होगी, शायद कोई एक-आध  कमेटी भी बनाई जाये. लेकिन आशंका तो यही है कि चार वर्षों बाद, टोक्यो ओलंपिक  की समाप्ति पर, हम वहीँ खड़े होंगे जहां आज हैं.
कई कारण हैं कि हम लोग खेलों में कभी भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाये. खिलाड़ियों के लिए सुविधाओं की कमी है, अच्छे कोच नहीं हैं, जो बच्चे व युवक-युवतियां खेलों में आगे बढ़ने का साहस करते भी हैं उन के लिए जीविका का प्रश्न सामने आकर खड़ा हो जाता है. अधिकतर स्पोर्ट्स एसोसिएशंस  के कर्ता-धर्ता वह लोग हैं जिनका खेलों से कोई भी नाता नहीं है.
पर मेरा मानना है कि अगर सुविधाओं में सुधार हो भी गया और अन्य  खामियों को भी थोड़ा-बहुत दूर कर दिया गया तब भी खेलों के हमारे प्रदर्शन में आश्चर्यजनक सुधार नहीं होगा.
किसी भी खेल में सफलता पाने के लिए दो शर्तों का पूरा करना आवश्यक होता है.
पहली शर्त है, अनुशासन. हर उस व्यक्ति के लिए, जो खेलों से किसी भी रूप में जुड़ा हो, अनुशासन का पालन करना अनिवार्य होता है. दिनचर्या में अनुशासन, जीवनशैली में अनुशासन, अभ्यास में अनुशासन. अगर संक्षिप्त में कहें तो इतना कहना उचित होगा कि अपने जीवन के हर पल पर खिलाड़ी का अनुशासन होना अनिवार्य है तभी वह सफलता की कामना कर सकता है.
दूसरी शर्त है टीम स्पिरिट की भावना. अगर आप टीम के रूप में खेल रहें हैं तो जब तक हर खिलाड़ी के भीतर यह भावना नहीं होगी तब तक सफलता असम्भव है. और अगर कोई खिलाड़ी अकेले ही खेल रहा तब भी अपने कोच वगेरह के साथ एक सशक्त टीम के रूप में उसे काम करना होगा.
अब हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या तो यह ही है कि अनुशासन के प्रति हम सब का रवैया बहुत ही निराशाजनक है. एक तरह से कहें तो अनुशासनहीनता हमारे जींस में है. अगर हम वीआइपी हैं तो अनुशासन की अवहेलना करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार बन जाता है. अगर हम वीआइपी नहीं भी हों तब भी हम लोग अनुशासन के प्रति उदासीन ही रहते हैं. चाहे टिकट काउंटर पर कतार में खड़े होने की बात हो या समय पर दफ्तर पहुँचने की, चाहे सड़क पर गाड़ी चलाने की बात हो या फूटपाथ पर कूड़ा फैंकने की, अनुशासन की प्रति हमारा अनादर हर बात में झलकता है.
टीम स्पिरिट की भी हम में बहुत कमी है. घर में चार भाई हों तो वह भी मिलकर एक साथ नहीं रह पाते. किसी दफ्तर में चले जाओ, वहां आपको अलग-अलग विभागों ओर अधिकारियों में रस्साकशी चलती दिखाई पड़ेगी. पार्लियामेंट में जीएसटी बिल एकमत से पास हुआ तो उसे एक ऐतिहासिक घटना माना जा रहा है. अन्यथा जो कुछ वहां होता है वह सर्वविदित है.
अनुशासन और टीम स्पिरिट ऐसी भावनाएं हैं जो सुविधाओं वगेरह पर निर्भर नहीं हैं, यह एक समाज की सोच पर निर्भर हैं. जिस तरह जापान विश्वयुद्ध के बाद खड़ा हुआ वह उनकी सोच का परिचायक है. हाल ही में एक भयंकर सुनामी के बाद जो कुछ हुआ हम सबके लिए एक संकेत है. इस विपदा से त्रस्त हो कर रोने-धोने के बजाय सब लोग उससे बाहर उभरने के लिए एक साथ जुट गए.
क्या अगले चार वर्षों में अनुशासन की भावना हम में उपज जायेगी? क्या इन चार वर्षों में जीवन के हर क्षेत्र में हम एक टीम की भांति काम करना शुरू कर देंगे? ऐसा लगता नहीं. चार वर्षों बाद भी पदक तालिका में हम कहीं नीचे ही विराजमान होंगे, और हर टीवी पर चल रही गर्मागर्म बहस का आनंद ले रहे होंगे.