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शनिवार, 23 सितंबर 2017

चिड़िया: बस, यूँ ही....

चिड़िया: बस, यूँ ही....: नौकरी, घर, रिश्तों का ट्रैफिक लगा,  ज़िंदगी की ट्रेन छूटी, बस यूँ ही !!! है दिवाली पास, जैसे ही सुना, चरमराई खाट टूटी, बस यूँ ही !!! ड...

शनिवार, 16 सितंबर 2017

Laxmirangam: हिंदी दिवस 2017 विशेष - हमारी राष्ट्रभाषा

Laxmirangam: हिंदी दिवस 2017 विशेष - हमारी राष्ट्रभाषा: हमारी राष्ट्रभाषा. परतंत्रता की सदियों मे स्वतंत्रता आंदोलन में लोगों को एक जुट करने के लिए राष्ट्रभाषा शब्द का शायद प्रथम प्रयोग...

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बुधवार, 13 सितंबर 2017

चिड़िया: पाषाण

चिड़िया: पाषाण: पाषाण सुना है कभी बोलते, पाषाणों को ? देखा है कभी रोते , पाषाणों को ? कठोरता का अभिशाप, झेलते देखा है ? बदलते मौसमों से, जूझते द...

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

Laxmirangam: दीपा

Laxmirangam: दीपा: दीपा हर दिन की तरह मुंबई की लोकल ट्रेन खचाखच भरी हुई थी. यात्री भी हमेशा की तरह अंदर बैठे , खड़े थे. गेट के पास कुछ यात्री हेंडल पकड़े ...

Laxmirangam: दीपा

Laxmirangam: दीपा: दीपा हर दिन की तरह मुंबई की लोकल ट्रेन खचाखच भरी हुई थी. यात्री भी हमेशा की तरह अंदर बैठे , खड़े थे. गेट के पास कुछ यात्री हेंडल पकड़े ...

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गुरुवार, 7 सितंबर 2017

Laxmirangam: आस्था : बहता पानी

Laxmirangam: आस्था : बहता पानी: आस्था : बहता पानी                 तैरना सीखने की चाह में,                 वह समुंदर किनारे                  अठखेलियाँ करन...

रविवार, 3 सितंबर 2017

चिड़िया: नुमाइश करिए

चिड़िया: नुमाइश करिए: दोस्ती-प्यार-वफा की, न अब ख्वाहिश करिए ये नुमाइश का जमाना है नुमाइश करिए । अब कहाँ वक्त किसी को जनाब पढ़ने का, इरादा हो भी, खत लिखने का,...

चिड़िया: शब्द

चिड़िया: शब्द:



शब्द

मानव की अनमोल धरोहर
ईश्वर का अनुपम उपहार,
जीवन के खामोश साज पर
सुर संगीत सजाते शब्द !!!

अनजाने भावों से मिलकर
त्वरित मित्रता कर लेते,
और कभी परिचित पीड़ा के
दुश्मन से हो जाते शब्द !!!

चुभते हैं कटार से गहरे
जब कटाक्ष का रूप धरें,
चिंगारी से बढ़ते बढ़ते
अग्निशिखा हो जाते शब्द !!!

कभी भौंकते औ' मिमियाते
कभी गरजते, गुर्राते !
पशु का अंश मनुज में कितना
इसको भी दर्शाते शब्द !!!

रूदन,बिलखना और सिसकना
दृश्यमान होता इनमें,
हँसना, मुस्काना, हरषाना
सब साझा कर जाते शब्द !!!

शब्द जख्म और शब्द दवा,
शब्द युद्ध और शब्द बुद्ध !
शब्दों में वह शक्ति भरी, जो
श्रोता को कर दे निःशब्द !!!

बिन पंखों के पंछी हैं ये
मन-पिंजरे में रहते कैद,
मुक्त हुए तो लौट ना पाएँ
कहाँ-कहाँ उड़ जाते शब्द !!!

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

 ग़ज़ल
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हाथ जब ये बढ़ा तो बढ़ा रह गया ,
जिंदगी भर दुआ मांगता रह गया

सर झुका ये सदा प्रेम से गर कभी
आँख के सामने बस खुदा रह गया

राज़ की बात इक़ दिन बताता तुम्हें
राज़ दिल में छिपा का छिपा रह गया

जिंदगी में कमाया बहुत था मगर
आख़िरी दौर में आज क्या रहा गया

रूठ जाओ अगर तो मना लूं तुम्हें
मान जाना तुम्हारी अदा रह गया

संजय कुमार गिरि
स्वरचित रचना सर्वाधिकार @कोपी राईट
31.8.2017
भोर  भई  रवि  की  किरणें  धरती  कर  आय  गईं  शरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा  कन-सा  अब  देर  नहीं  करना//
गान  करैं  चटका  चहुँओर   सुकाल  भई  सब  धावति  हैं
नीड़न  मा बचवा बचिगै  जिन मां  कर  याद  सतावति  हैं
फूलन  की  कलियॉ  निज  कोष  पसारि सुगंध लुटावति हैं
मानव हों अलि हों  सबको  निज  रूपन  मा  भरमावति हैं//
देख  सुकाल  सुमंगल  है   इनको   निज  नैनन  में  भरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा  कन-सा  अब  देर  नहीं  करना//
खेतन और बगीचन  पै  रजनी  निज  ऑसु  बहाय  गई  है
पोछन को रवि की किरणें द्युति साथ  धरातल  झीन नई है
पोशक दोष विनाशक जो अति कोमल-सी अनुभूति भई है
सागर में सुख के उठि के अब चातक मोतिन खोजि लई है//
दॉत  गिनै  मुख  खोलि  हरी  कर  भारत  भूमि नहीं डरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा  कन-सा  अब  देर  नहीं  करना//
खेतन  मा  मजदूर  किसान  सभी  निज काज सँवार रहे हैं
गाय बँधी बछवा बछिया  निज  भोजन  हेतु  जुहार  रहे  हैं
प्राण-अपान-समान-उदान तथा  नित  व्यान  पुकार  रहे  हैं
जीवन  की गति  है जहँ  लौ  सब  ईश्वर  के उपकार रहे हैं//
आय  सुहावन  पावन  काल   इसे  निज  अंकन  में  भरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा  कन-सा  अब  देर  नहीं   करना//
रैन गई चकवा  चकवी  विलगान  रहे  अब  आय  मिले  हैं
ताप मिटा मन कै सगरौ  तन  से  मन से पुनि जाय खिले हैं
बॉध रहे  अनुराग, विराग  सभी  उर  से  विसराय  किले  हैं
साधक  योग करैं  उठि  कै  तप  से निज हेतु बनाय विले है//
प्राण  सजीवनि  वायु  चली  अब  तौ   सगरौ दुख कै हरना
लाल  सवेर  भई  उठ   जा  कन-सा  अब  देर  नहीं  करना//
यह है जल लो मुख धो  करके अभिनंदन सूरज का कर लो
मिटता मन का सब  ताप उसे  तुम भी अपने उर में भर लो
बल-आयु बढ़े यश भी  बढ़ता  नित ज्ञान मिलै उर में धर लो
अपमान मिले सनमान मिले  सुख की अनुभूति करो उर लो//
जाय  पढ़ो  गुरु  से  तुम   पाठ   प्रणाम  करो  उनके  चरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा   कन-सा   अब  देर  नहीं  करना//

एक गीत : कुंकुम से नित माँग सजाए----

गीत : कुंकुम से नित माँग सजाए---


कुंकुम से नित माँग सजाए ,प्रात: आती कौन ?

प्राची की घूँघट अधखोले
अधरों के दो-पट ज्यों डोले

मलय गन्ध में डूबी डूबी ,तुम सकुचाती कौन?

फूलों के नव गन्ध बिखेरे
अभिमन्त्रित रश्मियां सबेरे

करता कलरव गान विहग जब, तुम शरमाती कौन ?

प्रात समीरण गाता आता
आशाओं की किरण जगाता

छम छम करती उतर रही हो, पलक झुकाती कौन ?

लहरों के दर्पण भी हारे
जब जब तुम ने रूप निहारे

पूछ रहे हैं विकल किनारे ,तुम इठलाती कौन?
कुंकुम से नित माँग सजाए ,प्रात: आती कौन ?

-आनन्द.पाठक-