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शनिवार, 23 सितंबर 2017

चिड़िया: बस, यूँ ही....

चिड़िया: बस, यूँ ही....: नौकरी, घर, रिश्तों का ट्रैफिक लगा,  ज़िंदगी की ट्रेन छूटी, बस यूँ ही !!! है दिवाली पास, जैसे ही सुना, चरमराई खाट टूटी, बस यूँ ही !!! ड...

शनिवार, 16 सितंबर 2017

Laxmirangam: हिंदी दिवस 2017 विशेष - हमारी राष्ट्रभाषा

Laxmirangam: हिंदी दिवस 2017 विशेष - हमारी राष्ट्रभाषा: हमारी राष्ट्रभाषा. परतंत्रता की सदियों मे स्वतंत्रता आंदोलन में लोगों को एक जुट करने के लिए राष्ट्रभाषा शब्द का शायद प्रथम प्रयोग...

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बुधवार, 13 सितंबर 2017

चिड़िया: पाषाण

चिड़िया: पाषाण: पाषाण सुना है कभी बोलते, पाषाणों को ? देखा है कभी रोते , पाषाणों को ? कठोरता का अभिशाप, झेलते देखा है ? बदलते मौसमों से, जूझते द...

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

Laxmirangam: दीपा

Laxmirangam: दीपा: दीपा हर दिन की तरह मुंबई की लोकल ट्रेन खचाखच भरी हुई थी. यात्री भी हमेशा की तरह अंदर बैठे , खड़े थे. गेट के पास कुछ यात्री हेंडल पकड़े ...

Laxmirangam: दीपा

Laxmirangam: दीपा: दीपा हर दिन की तरह मुंबई की लोकल ट्रेन खचाखच भरी हुई थी. यात्री भी हमेशा की तरह अंदर बैठे , खड़े थे. गेट के पास कुछ यात्री हेंडल पकड़े ...

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गुरुवार, 7 सितंबर 2017

Laxmirangam: आस्था : बहता पानी

Laxmirangam: आस्था : बहता पानी: आस्था : बहता पानी                 तैरना सीखने की चाह में,                 वह समुंदर किनारे                  अठखेलियाँ करन...

रविवार, 3 सितंबर 2017

चिड़िया: नुमाइश करिए

चिड़िया: नुमाइश करिए: दोस्ती-प्यार-वफा की, न अब ख्वाहिश करिए ये नुमाइश का जमाना है नुमाइश करिए । अब कहाँ वक्त किसी को जनाब पढ़ने का, इरादा हो भी, खत लिखने का,...

चिड़िया: शब्द

चिड़िया: शब्द:



शब्द

मानव की अनमोल धरोहर
ईश्वर का अनुपम उपहार,
जीवन के खामोश साज पर
सुर संगीत सजाते शब्द !!!

अनजाने भावों से मिलकर
त्वरित मित्रता कर लेते,
और कभी परिचित पीड़ा के
दुश्मन से हो जाते शब्द !!!

चुभते हैं कटार से गहरे
जब कटाक्ष का रूप धरें,
चिंगारी से बढ़ते बढ़ते
अग्निशिखा हो जाते शब्द !!!

कभी भौंकते औ' मिमियाते
कभी गरजते, गुर्राते !
पशु का अंश मनुज में कितना
इसको भी दर्शाते शब्द !!!

रूदन,बिलखना और सिसकना
दृश्यमान होता इनमें,
हँसना, मुस्काना, हरषाना
सब साझा कर जाते शब्द !!!

शब्द जख्म और शब्द दवा,
शब्द युद्ध और शब्द बुद्ध !
शब्दों में वह शक्ति भरी, जो
श्रोता को कर दे निःशब्द !!!

बिन पंखों के पंछी हैं ये
मन-पिंजरे में रहते कैद,
मुक्त हुए तो लौट ना पाएँ
कहाँ-कहाँ उड़ जाते शब्द !!!

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

 ग़ज़ल
------------------------

हाथ जब ये बढ़ा तो बढ़ा रह गया ,
जिंदगी भर दुआ मांगता रह गया

सर झुका ये सदा प्रेम से गर कभी
आँख के सामने बस खुदा रह गया

राज़ की बात इक़ दिन बताता तुम्हें
राज़ दिल में छिपा का छिपा रह गया

जिंदगी में कमाया बहुत था मगर
आख़िरी दौर में आज क्या रहा गया

रूठ जाओ अगर तो मना लूं तुम्हें
मान जाना तुम्हारी अदा रह गया

संजय कुमार गिरि
स्वरचित रचना सर्वाधिकार @कोपी राईट
31.8.2017
भोर  भई  रवि  की  किरणें  धरती  कर  आय  गईं  शरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा  कन-सा  अब  देर  नहीं  करना//
गान  करैं  चटका  चहुँओर   सुकाल  भई  सब  धावति  हैं
नीड़न  मा बचवा बचिगै  जिन मां  कर  याद  सतावति  हैं
फूलन  की  कलियॉ  निज  कोष  पसारि सुगंध लुटावति हैं
मानव हों अलि हों  सबको  निज  रूपन  मा  भरमावति हैं//
देख  सुकाल  सुमंगल  है   इनको   निज  नैनन  में  भरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा  कन-सा  अब  देर  नहीं  करना//
खेतन और बगीचन  पै  रजनी  निज  ऑसु  बहाय  गई  है
पोछन को रवि की किरणें द्युति साथ  धरातल  झीन नई है
पोशक दोष विनाशक जो अति कोमल-सी अनुभूति भई है
सागर में सुख के उठि के अब चातक मोतिन खोजि लई है//
दॉत  गिनै  मुख  खोलि  हरी  कर  भारत  भूमि नहीं डरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा  कन-सा  अब  देर  नहीं  करना//
खेतन  मा  मजदूर  किसान  सभी  निज काज सँवार रहे हैं
गाय बँधी बछवा बछिया  निज  भोजन  हेतु  जुहार  रहे  हैं
प्राण-अपान-समान-उदान तथा  नित  व्यान  पुकार  रहे  हैं
जीवन  की गति  है जहँ  लौ  सब  ईश्वर  के उपकार रहे हैं//
आय  सुहावन  पावन  काल   इसे  निज  अंकन  में  भरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा  कन-सा  अब  देर  नहीं   करना//
रैन गई चकवा  चकवी  विलगान  रहे  अब  आय  मिले  हैं
ताप मिटा मन कै सगरौ  तन  से  मन से पुनि जाय खिले हैं
बॉध रहे  अनुराग, विराग  सभी  उर  से  विसराय  किले  हैं
साधक  योग करैं  उठि  कै  तप  से निज हेतु बनाय विले है//
प्राण  सजीवनि  वायु  चली  अब  तौ   सगरौ दुख कै हरना
लाल  सवेर  भई  उठ   जा  कन-सा  अब  देर  नहीं  करना//
यह है जल लो मुख धो  करके अभिनंदन सूरज का कर लो
मिटता मन का सब  ताप उसे  तुम भी अपने उर में भर लो
बल-आयु बढ़े यश भी  बढ़ता  नित ज्ञान मिलै उर में धर लो
अपमान मिले सनमान मिले  सुख की अनुभूति करो उर लो//
जाय  पढ़ो  गुरु  से  तुम   पाठ   प्रणाम  करो  उनके  चरना
लाल  सवेर  भई  उठ  जा   कन-सा   अब  देर  नहीं  करना//

एक गीत : कुंकुम से नित माँग सजाए----

गीत : कुंकुम से नित माँग सजाए---


कुंकुम से नित माँग सजाए ,प्रात: आती कौन ?

प्राची की घूँघट अधखोले
अधरों के दो-पट ज्यों डोले

मलय गन्ध में डूबी डूबी ,तुम सकुचाती कौन?

फूलों के नव गन्ध बिखेरे
अभिमन्त्रित रश्मियां सबेरे

करता कलरव गान विहग जब, तुम शरमाती कौन ?

प्रात समीरण गाता आता
आशाओं की किरण जगाता

छम छम करती उतर रही हो, पलक झुकाती कौन ?

लहरों के दर्पण भी हारे
जब जब तुम ने रूप निहारे

पूछ रहे हैं विकल किनारे ,तुम इठलाती कौन?
कुंकुम से नित माँग सजाए ,प्रात: आती कौन ?

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

Laxmirangam: संप्रेषण और संवाद

Laxmirangam: संप्रेषण और संवाद:



संप्रेषण और संवाद



आपके कानों में किसी की आवाज सुनाई देती है. शायद कोई प्रचार हो रहा है. पर भाषा आपकी जानी पहचानी नहीं है. इससे आप उसे ...

बुधवार, 16 अगस्त 2017

एक गीत :--------तो क्या हो गया

                एक गीत : --------तो क्या हो गया

तेरी खुशियों में शामिल सभी लोग हैं ,एक मैं ही न शामिल तो क्या हो  गया !

ज़िन्दगी थी गुज़रनी ,गुज़र ही गई
बाक़ी जो भी बची है ,गुज़र जाएगी
दो क़दम साथ देकर चली छोड़ कर
ज़िन्दगी अब न जाने किधर जाएगी 
तेरी यादों का मुझको सहारा बहुत ,एक तू ही न हासिल तो क्या हो गया !

किसको मिलती हैँ खुशियाँ यहाँ उम्र भर
कौन है जो मुहब्बत  में  रोया नहीं 
मंज़िलें भी मिलीं तो उसी को मिलीं
आज तक राह में जो है सोया नहीं
चार दिन की मिली थी मुझे भी ख़ुशी,अब है टूटा हुआ दिल तो क्या हो गया !

एक   ढूँढे,   मिलेंगे    हज़ारों   तुझे
चाहने वालों की  यूँ  कमी तो नहीं
कैसे समझी कि कल मैं बदल जाऊंगा
प्यार मेरा कोई मौसमी तो नहीं
तेरी नज़रों में क़ाबिल सभी लोग हैं ,एक मैं  ही न क़ाबिल तो क्या हो गया

मैने तुझ से कभी कुछ कहा ही नहीं
बात क्या हो गई  तू ख़फ़ा हो गई
बेरुखी ये तिरी और मुँह फेरना 
कुछ बता तो सही क्या ख़ता हो गई

किसकी कश्ती है डूबी नहीं प्यार में,छू सका मैं  न साहिल ,तो क्या हो गया
तेरी खुशियों में शामिल सभी लोग हैं,एक मैं ही न शामिल तो क्या हो  गया

-आनन्द.पाठक-


 

रविवार, 6 अगस्त 2017

Now that you pamper the soulful me

Now that you pamper  the soulful me  
Why won't  you pamper the bodily me 

You are the  he and I am the  she 
Why won't you love the she in me 

I am the nectar that feeds your soul 
Why won't you be my honey bee 

The fire, desires in the ember me 
Why won't you be my inferno spree 

The touch that renaissance the bodily me 

Why won't you be Leonardo da Vinci 

बुधवार, 26 जुलाई 2017

रूप तुम्हारा खिला कंवल है (गीत )

गीत 
रूप तुम्हारा खिला कँवल है 
हिरनी जैसी चाल है
मन्द मन्द मुस्कान तुम्हारी
मुख पर लगा गुलाल है
नैनों से नैना टकराये
दिल में मचा धमाल है
रूप तुम्हारा खिला कँवल है
हिरनी जैसी चाल है

बोल तुम्हारे मिश्री जैसे
मुखड़ा कोमल लाल है
अंग अंग कुंदन सा दमके
लगा सोलवाँ साल है
रूप तुम्हारा खिला कँवल है
हिरनी जैसी चाल है

खूब बरसते बादल आकर
मनवा अब बेहाल है
मधुरस टपके अधरों से जब
लगता बहुत कमाल है
रूप तुम्हारा खिला कँवल है
हिरनी जैसी चाल है
रूप तुम्हारा खिला कँवल है
हिरनी जैसी चाल है


संजय कुमार गिरि
गीत 
रूप तुम्हारा खिला कँवल है 
हिरनी जैसी चाल है
मन्द मन्द मुस्कान तुम्हारी
मुख पर लगा गुलाल है
नैनों से नैना टकराये
दिल में मचा धमाल है
रूप तुम्हारा खिला कँवल है
हिरनी जैसी चाल है

बोल तुम्हारे मिश्री जैसे
मुखड़ा कोमल लाल है
अंग अंग कुंदन सा दमके
लगा सोलवाँ साल है
रूप तुम्हारा खिला कँवल है
हिरनी जैसी चाल है

खूब बरसते बादल आकर
मनवा अब बेहाल है
मधुरस टपके अधरों से जब
लगता बहुत कमाल है
रूप तुम्हारा खिला कँवल है
हिरनी जैसी चाल है
रूप तुम्हारा खिला कँवल है
हिरनी जैसी चाल है


संजय कुमार गिरि

 

सोमवार, 24 जुलाई 2017

Laxmirangam: इस गली में आना छोड़ दो

Laxmirangam: इस गली में आना छोड़ दो:                                 इस गली में आना छोड़ दो                             रे चाँद ,                  हर रात , इस गली...

सोमवार, 17 जुलाई 2017

एक ग़ज़ल : दिल न रोशन हुआ----

एक ग़ज़ल :  दिल न रोशन हुआ-----

दिल न रोशन हुआ ,लौ लगी भी नही, फिर इबादत का ये सिलसिला किस लिए
फिर ये चन्दन ,ये टीका,जबीं पे निशां और  तस्बीह  माला  लिया किस लिए 

सब को मालूम है तेरे घर का पता ,हो कि पण्डित पुजारी ,मुअल्लिम कोई
तू मिला ही नहीं लापता आज तक ,ढूँढने का अलग ही मज़ा  किस लिए   

निकहत-ए-ज़ुल्फ़ जाने कहाँ तक गईं ,लोग आने लगे बदगुमां हो इधर
यार मेरा अभी तक तो आया नहीं ,दिल है राह-ए-वफ़ा में खड़ा  किस लिए       

तिश्नगी सब की होती है इक सा सनम,क्या शज़र ,क्या बसर,क्या है धरती चमन 
प्यास ही जब नहीं बुझ सकी आजतक,फिर ये ज़ुल्फ़ों की काली घटा किस लिए 

बज़्म में सब तुम्हारे रहे आशना .  एक मैं ही रहा  अजनबी की तरह
वक़्त-ए-रुखसत निगाहें क्यों नम हो गईं,फिर वो दस्त-ए-दुआ था उठा किस लिए 

माल-ओ-ज़र ,कुछ अना, कुछ किया कजरवी, जाल तुमने बुना क़ैद भी ख़ुद रहा
फिर रिहाई का क्यूँ अब तलबगार है  ,दाम-ए हिर्स-ओ-हवस था बुना किस लिए   

तुम में ’आनन’ यही बस बुरी बात है ,प्यार से जो मिला तुम उसी के हुए
कुछ भी देखा नहीं ,क्या सही क्या ग़लत, प्यार में फिर ये  धोखा मिला किस लिए  

-आनन्द.पाठक-
08800927181

शब्दार्थ
तस्बीह = जप माला
मुअल्लिम= अध्यापक
निकहत-ए-ज़ुल्फ़= बालों की महक
तिशनगी  = प्यास
वक़्त-ए-रुखसत = जुदाई के समय
माल-ओ-ज़र  = धन सम्पति
अना = अहम
कजरवी =अत्याचार अनीति जुल्म
दाम-ए-हिर्स-ओ-हवस  = लोभ लालच लिप्सा के जाल

दिल्ली से चेन्नई : एक लम्बी ट्रेन यात्रा

दिल्ली से चेन्नई : एक लम्बी ट्रेन यात्रा



4 महीने से जिस दिन का इंतज़ार कर रहा था आख़िरकार वो दिन आ गया। आज रात 10 बजे तमिलनाडु एक्सप्रेस से चेन्नई के लिए प्रस्थान करना था। मम्मी पापा एक दिन पहले ही दिल्ली पहुंच चुके थे। यात्रा की सारी तैयारियां भी लगभग पूरी हो चुकी थी। मैं सुबह समय से ऑफिस  के लिए निकल गया। चूंकि ट्रेन रात में 10:30 बजे थी इसलिए ऑफिस से भी समय से पहले निकलने की कोई जल्दी नहीं थी, पर ये घुम्मकड़ मन कहाँ मानता है और 4 बजे ही ऑफिस से निकल गया। घर आकर तैयारियों का जायजा लिया और बची हुई तैयारियों में लग गया। 7 बजे तक सब कुछ तैयार था, बस अब जाते समय सामान उठाकर निकल जाना था। साढ़े सात बजे तक सब लोग खाना भी खा चुके और 9 बजने का इंतज़ार करने लगे। अभी एक घंटा समय हमारे पास बचा हुआ था और इस एक घंटे में मेरे मन में अच्छे-बुरे खयाल आ रहे थे, अनजान जगह पर जहाँ भाषा की समस्या सबसे ज्यादा परेशान करती है उन जगहों पर पता नहीं क्या क्या समस्या आएगी। इसी उधेड़बुन में कब एक घंटा बीत गया पता नहीं चला।

शनिवार, 15 जुलाई 2017

एक क़ता-----

एक क़ता-----

भला होते मुकम्मल कब यहाँ पे इश्क़ के किस्से
कभी अफ़सोस मत करना कि हस्ती हार जाती है

पढ़ो ’फ़रहाद’ का किस्सा ,यकीं आ जायेगा तुम को
मुहब्बत में कभी ’तेशा’ भी बन कर मौत आती है

जो अफ़साना अधूरा था विसाल-ए-यार का ’आनन’
चलो बाक़ी सुना दो अब कि मुझको नीद आती है

-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 12 जुलाई 2017

एक लघु चिन्तन:--देश हित में

एक लघु चिन्तन : --"देश हित में"

जिन्हें घोटाला करना है वो घोटाला करेंगे---जिन्हें लार टपकाना है वो लार टपकायेगें---जिन्हें विरोध करना है वो विरोध करेंगे--- सब अपना अपना काम करेगे ।
ख़ुमार बाराबंकी साहब का एक शे’र है

न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है , हवा चल रही  है 

दोनो अपना अपना काम कर रहे हैं} एक कमल है जो कीचड़ में खिलता है और दूसरा कमल का पत्ता है जो सदा पानी के ऊपर रहता है --पानी ठहरता ही नहीं उस पर।
----आजकल होटल -ज़मीन -माल -घोटाला की हवा चल रही है -थक नहीं रही है -- बादल घिर तो रहे हैं मगर बरस नहीं रहे हैं।

-----जो देश की चिन्ता करे वो बुद्धिजीवी
-----जो चिन्ता न करे वो ’सुप्त जीवी’
------जो ;पुरस्कार’  लौटा दे वो ’सेक्युलर’
-------और जो न लौटाए वो ’कम्युनल’  है
----------
मैं कोई पुरस्कार का”जुगाड़’ तो कर नहीं पाया तो लौटाता क्या । नंगा ,नहाता क्या---निचोड़ता क्या

सोचा एक लघु चिन्तन ही कर लें  तब तक -’देश हित मे’ --- दुनिया यह न समझ ले कि  कैसा ’ सुप्त जीवी प्राणी ’ है यह कि ’ताल ठोंक कर’- बहस भी नहीं देखता।
---------
कल ’लालू जी’ ने एक निर्णय लिया --देश हित में
आज ’नीतीश जी’ ने एक निर्णय लिया --देश हित में
भाजपा ने  एक ’चारा’ फ़ेंका --  देश हित में
एक ने  वो ’चारा’ नहीं खाया --देश हित में
दूसरा ’ चारा’  खा ले  शायद --देश हित में
तीसरा ’हाथ’ दिखा दिखा कर थक गया ---देश हित मे

तो क्या? सब का ’देश हित’ अलग अलग है ।
या सबका  ’देश हित’ एक है --कुर्सी-
और जनता ?
----जनता चुप होकर देखती है -----देश हित में
 -ग़ालिब का शेर गुनगुनाती है

बाचीज़ा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे

गो हाथ में जुम्बिश नहीं आंखों में तो दम है
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे


जनता के लिए कौन है रोता यहां प्यारे
सिद्धान्त" गया भाड़ में , ’सत्ता’ मेरे आगे

आखिरी वाला शेर गालिब ने नहीं कहा था।
 हाँ , अगरऔर ज़िन्दा रहते--तो यही कहते---" कि खुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता "-। ख़ुदा मगफ़िरत करे

जनता तो --बस तमाशा देख रही  है -- आश्वस्त है कि ये सभी ’रहनुमा’ मेरे लिये  चिन्ता कर रहे हैं॥ हमें क्या करना ! -हमे तो 5-साल बाद चिन्ता करना है ।एक सज्जन ने लोकतन्त्र का रहस्य बड़े मनोयोग से सुनाया--"बाबा !जानत हईं ,जईसन जनता चाही वईसन सरकार आई" ---मैंने  परिभाषा पर तो ध्यान नहीं दिया मगर ’बाबा’ के नाम से ज़रूर सजग हो गया--पता नहीं यह कौन वाला  ’बाबा ’ समझ रहा है मुझे।
------
उस ने कहा था---महागठ्बन्धन है ---टूटेगा नहीं---’फ़ेविकोल से भी ज़्यादे का भरोसा है --जब तक ’कुर्सी’ नहीं छूटेगी ----गठबन्धन नही टूटेगा--- सत्ता का शाश्वत  सत्य है---- जनता मगन होई  नाचन लागी --- ’सुशासन’ महराज की जय
भईए ! हम तो ’समाजवाद’ लाने को निकले थे ---सम्पूर्ण क्रान्ति करने निकले थे --।हम पर तो बस  समझिए  ’जयप्रकाश नारायण जी ’ का आशीर्वाद रहा कि फल फूल रहे है जैसे अन्ना हज़ारे जी के चेले फल फूल रहे है जैसे गाँधी जी के चेले फल फूल लिए।
और जनता -कल भी वहीं थी  आज भी वहीं है---]सम्पूर्ण क्रान्ति’ के इन्तिज़ार में---

नई सुबह की नई रोशनी लाने को जो लोग गए थे
अंधियारे  लेकर लौटे हैं जंगलात से घिरे शहर  में

 दुनिया में क्या सम्पूर्ण है, सिवा भगवान के --वो तो मिलने से रहे। बस जो मिला वही लेते आये अपने घर ---बेटी  दमाद  बेटा-बहू भाई ,भतीजा --सब समाजवादी हो गए -चेहरे पे नूर आ गया ।कहते हैं- चिराग पहले घर में ही जलाना चाहिए --। सो मैने घर में ही ’समाजवाद’ का चिराग जला दिया-क्या बुरा किया-। कहने दीजिए लोहिया जी को--ज़िन्दा क़ौमे 5-साल इन्तिज़ार नहीं करती----
 मैने कहा था--भइए----
साथ अगर है छूटेगा ही
’गठ बन्धन’ है टूटेगा ही
कुर्सी पे चाहे जो बैठे
बैठा है  तो लूटेगा  ही 
’हाथ’ भला अब क्या करलेगा
डूबा है तो डूबेगा ही

 ऋषि मुनियों ने कहा ----वत्स आनन्द ! ज़्यादे चिन्ता करने का नी। चिन्ता ,चिता समान है।
कहाँ तक चिन्ता करुँ -झोला लट्काए ।,मेरे जैसे चिन्तक के लिए इतना ही चिन्ता काफी है -- सो अब आज का चिन्तन यहीं तक। कल की चिन्ता कल पर।
अस्तु

-आनन्द पाठक-
08800927181


सोमवार, 10 जुलाई 2017

एक ग़ैर रवायती ग़ज़ल : कहने को कह रहा है------

एक  ग़ैर रवायती ग़ज़ल : कहने को कह रहा है-----

कहने को कह रहा है कि वो बेकसूर है
लेकिन कहीं तो दाल में काला ज़रूर है

लाया "समाजवाद" ग़रीबो  से छीन कर 
बेटी -दमाद ,भाई -भतीजों  पे नूर है

काली कमाई है नही, सब ’दान’ में मिला
मज़लूम का मसीहा है साहिब हुज़ूर है

ऐसा  धुँआ उठा कि कहीं कुछ नहीं दिखे
वो दूध का धुला है -बताता  ज़रूर  है

’कुर्सी ’ दिखी  उसूल सभी  फ़ाख़्ता हुए
ठोकर लगा ईमान किया चूर चूर  है

सत्ता का ये नशा है कि सर चढ़ के बोलता
जिसको भी देखिये वो सर-ए-पुर-ग़रूर है

ये रहनुमा है क़ौम के क़ीमत वसूलते
’आनन’ फ़रेब-ए-रहनुमा पे क्यों सबूर है ?

-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ -
सबूर = सब्र करने वाला/धैर्यवान
सर-ए-पुर ग़रूर =घमंडी/अहंकारी

शनिवार, 8 जुलाई 2017

शनिवार, 1 जुलाई 2017

एक ग़ज़ल : मिल जाओ अगर तुम तो-----

एक ग़ज़ल :  मिल जाओ अगर तुम---

मिल जाओ अगर तुम तो ,मिल जाये खुदाई है
क्यों तुम से करूँ परदा , जब दिल में सफ़ाई है

देखा तो नहीं अबतक . लेकिन हो ख़यालों में 
सीरत की तेरी मैने ,  तस्वीर   बनाई   है

लोगों से सुना था कुछ , कुछ जिक्र किताबों में  
कुछ रंग-ए-तसव्वुर से , रंगोली  सजाई  है

माना कि रहा हासिल ,कुछ दर्द ,या चश्म-ए-नम
पर रस्म थी उल्फ़त की,  शिद्दत  से निभाई है

ज़ाहिद ने बहुत रोका ,दिल है कि नहीं माना
बस इश्क़-ए-बुतां ख़ातिर ,इक उम्र  गँवाई  है

ये इश्क़-ए-हक़ीक़ी है ,या इश्क़-ए-मजाज़ी है
दोनो की इबादत में ,गरदन ही झुकाई  है

’आनन’ जो कभी तूने ,दिल खोल दिया होता
ख़ुशबू  तो तेरे दिल के ,अन्दर ही समाई  है

-आनन्द.पाठक-      मो0  088927181
शब्दार्थ:-
सीरत   = चारित्रिक विशेषताएं
रंग-ए-तसव्वुर= कल्पनाओं के रंग से
चस्म-ए-नम   = आँसू भरी आंख , दुखी
शिद्दत से = मनोयोग से
इश्क़-ए-हक़ीकी= आध्यात्मिक/अलौकिक प्रेम
इश्क़-ए-मजाज़ी = सांसारिक प्रेम

शनिवार, 24 जून 2017

चन्द माहिया : क़िस्त 42

चन्द माहिया  :क़िस्त 42

:1:
दो चार क़दम चल कर
छोड़ तो ना दोगे ?
सपना बन कर ,छल कर

:2:
जब तुम ही नहीं हमदम
सांसे  भी कब तक
अब देगी साथ ,सनम !

:3:
जज्बात की सच्चाई
नापोगे कैसे ?
इस दिल की गहराई

:4;
सबसे है रज़ामन्दी
सबसे मिलते हो
बस मुझ पर पाबन्दी

:5:
क्या और तवाफ़ करूँ
इतना ही जाना
मन को भी साफ़ करूँ

-आनन्द.पाठक-
08800927181

शब्दार्थ
तवाफ़ = परिक्रमा करना

गुरुवार, 22 जून 2017

मेरे मन की



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शुक्रिया

रविवार, 11 जून 2017

चन्द माहिया : क़िस्त 41

चन्द माहिया: क़िस्त 41

:1:

सदक़ात भुला मेरा
एक गुनह तुम को
बस याद रहा मेरा

:2:
इक चेहरा क्या भाया
हर चेहरे में वो
मख़्सूस नज़र आया

;3:
कर देता है पागल 
जब जब साने से
ढलता है तेरा आँचल

:4:
उल्फ़त की यही ख़ूबी
पार लगी उसकी
कश्ती जिसकी  डूबी

:5:
इतना ही समझ लेना
मै हूँ तो तुम हो
क्या और सनद देना


-आनन्द.पाठक-
08800927181
शब्दार्थ
सदक़ात  = [सदक़ा का बहु वचन] अच्छे कार्य  सत्कर्म .दान , न्यौछावर आदि
मख़्सूस   = ख़ास तौर से
साने से    = कंधे से
सनद       = प्रमाण-पत्र

शनिवार, 10 जून 2017

♥कुछ शब्‍द♥: तलाश___|||

♥कुछ शब्‍द♥: तलाश___|||: वह बेज़ान पड़ी घूर रही है घर की दीवारों को कभी छत को कभी उस छत से लटक रहे पंखे को उसकी नजरें तलाश रहीं है आज  उन नजरों में परवाह जरा सी अपने ...

शनिवार, 3 जून 2017

♥कुछ शब्‍द♥: इक सफर___|||

♥कुछ शब्‍द♥: इक सफर___|||: मासूम सा प्रेम मेरा  परिपक्य हो गया  वक़्त के थपेड़ो से  सख्त हो गया  किया न गया तुमसे कदर इस दिल का  आंखे देखों मेरी  सुखकर बंजर हो ग...

गुरुवार, 1 जून 2017

एक ग़ज़ल : ज़िन्दगी न हुई----

एक ग़ज़ल : ज़िन्दगी ना हुई बावफ़ा आजतक------

ज़िन्दगी   ना  हुई  बावफ़ा आज तक
फिर भी शिकवा न कोई गिला आजतक

एक चेहरा   जिसे  ढूँढता  मैं  रहा
उम्र गुज़री ,नहीं वो मिला  आजतक

दिल को कितना पढ़ाता मुअल्लिम रहा
इश्क़ से कुछ न आगे पढ़ा  आजतक

एक जल्वा नुमाया  कभी  ’तूर’ पे
बाद उसके कहीं ना दिखा आज तक

आप से क्या घड़ी दो घड़ी  मिल लिए
रंज-ओ-ग़म का रहा सिलसिला आजतक

  एक निस्बत अज़ल से रही आप से
राज़ क्या है ,नहीं कुछ खुला आजतक

तेरे सजदे में ’आनन’ कमी कुछ तो है
फ़ासिला क्यों नहीं कम हुआ आजतक ?


-आनन्द.पाठक--
08800927181

शब्दार्थ
मुअल्लिम =पढ़ानेवाला ,अध्यापक
नुमाया = दिखा/प्रकट
तूर = एक पहाड़ का नाम जहाँ ख़ुदा
ने हजरत मूसा से कलाम [बात चीत] फ़र्माया था
निस्बत =संबन्ध
अज़ल =अनादि काल से

बुधवार, 31 मई 2017

Laxmirangam: निर्णय ( भाग 2)

Laxmirangam: निर्णय ( भाग 2): निर्णय (भाग 2)                                                   (भाग 1 से आगे) रजत भी समझ नहीं पा रहा था कि कैसे अपनी भावना संजना ...

मंगलवार, 30 मई 2017

ज्वालादेवी से धर्मशाला (Jwaladevi to Dharamshala)

ज्वालादेवी से धर्मशाला (Jwaladevi to Dharamshala)


कल पूरे दिन के सफर की थकान और बिना खाये पूरे दिन रहने के बाद रात को खाना खाने के बाद जो नींद आयी वो एक ही बार 4:30 बजे मोबाइल में अलार्म बजने के साथ ही खुला। बिस्तर से उठकर जल्दी से मैं नहाने की तैयारी में लग गया। फटाफट नहा-धोकर तैयार हुआ और सारा सामान पैक किया। इतना करते करते 5 :30 बज गए। अब कल की योजना के मुताबिक एक बार फिर माँ ज्वालादेवी के दर्शन के लिए चल दिया। बाहर घुप्प अँधेरा था। इक्का-दुक्का लोग ही मंदिर के रास्ते पर मिल रहे थे। कुछ देर में हम मंदिर पहुँच गए। यहाँ मुश्किल से इस समय 25 -30 लोग ही थी। अभी मंदिर खुलने में कुछ समय था। कुछ देर में आरती आरम्भ हो गयी। आरती समाप्त होते होते मेरे पीछे करीब 300 से 400 लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी।

शनिवार, 27 मई 2017

♥कुछ शब्‍द♥: छोड़ चली हूँ___|||

♥कुछ शब्‍द♥: छोड़ चली हूँ___|||: मैं छोड़ चली हूँ अब तुम्हें हृदय में तुम्हारी याद लिए अनुराग के मधुर क्षणों संग वियोग की पीड़ा अथाह लिए कप्पन लिए पैरों में अपने अवशेष प्...

शुक्रवार, 26 मई 2017

Laxmirangam: निर्णय

Laxmirangam: निर्णय: निर्णय ( भाग -1) बी एड में अलग अलग कॉलेजो से आए हुए अलग अलग विधाओं के विद्यार्थी थे । सबकी शैक्षणिक योग्यताएँ भी समान नहीं थीं । रजत ...

बुधवार, 24 मई 2017

एक ग़ज़ल : ज़रा हट के---ज़रा बच के---

           एक मज़ाहिका ग़ज़ल :---ज़रा हट के ---ज़रा बच के---


मेरे भी ’फ़ेसबुक’ पे कदरदान बहुत हैं
ख़ातून भी ,हसीन  मेहरबान  बहुत हैं

"रिक्वेस्ट फ़्रेन्डशिप" पे हसीना ने ये कहा-
"लटके हैं पाँव कब्र में ,अरमान बहुत हैं"

’अंकल’ -न प्लीज बोलिए ऎ मेरे जान-ए-जाँ
’अंकल’, जो आजकल के हैं ,शैतान बहुत हैं

टकले से मेरे चाँद पे ’हुस्ना !’ न जाइओ
पिचके भले हो गाल ,मगर शान बहुत है

हर ’चैट रूम’ में सभी हैं जानते मुझे
कमसिन से,नाज़नीन से, पहचान बहुत है

पहलू में मेरे आ के ज़रा बैठिए ,हुज़ूर !
घबराइए नहीं ,मेरा ईमान बहुत है 

’बुर्के’ की खींच ’सेल्फ़ी’ थमाते हुए कहा 
"इतना ही आप के लिए सामान बहुत है"

’व्हाट्अप’ पे सुबह-शाम ’गुटर-गूँ" को देख कर
टपकाएँ लार शेख जी ,परेशान बहुत हैं

आदत नहीं गई है ’रिटायर’ के बाद भी
’आनन’ पिटेगा तू कभी इमकान बहुत है

बेगम ने जब ’ग़ज़ल’ सुनी ,’बेलन’ उठा लिया
’आनन मियां’-’बेलन’ मे अभी जान बहुत है


-आनन्द.पाठक-
08800927181

शब्दार्थ
हुस्ना   = हसीना
इमकान = संभावना
"गुटर-गूं" = आप सब जानते होंगे नहीं तो किसी ’कबूतर-कबूतरी’ से पूछ लीजियेगा
हा हा हा


♥कुछ शब्‍द♥: #बसयूँही

♥कुछ शब्‍द♥: #बसयूँही: सदियों से वो लिखती आई प्रेम आंधी में तूफान में बाढ़ में सैलाब में लेकिन कभी देख न पाई वक़्त के थपेड़ों ने उस स्याही को कर दिया था फ...

मंगलवार, 23 मई 2017

♥कुछ शब्‍द♥: युद्ध

♥कुछ शब्‍द♥: युद्ध: छिड़ चूका है युद्ध भयानक और मैं अबकी इंतजार में हूँ अपनी आत्मा के हार जाने का अपनी इस घुटी हुई परिस्थितियों से उबरने के लिए______ मैंने...

Laxmirangam: पुस्तक प्रकाशन

Laxmirangam: पुस्तक प्रकाशन: पुस्तक प्रकाशन हर रचनाकार , चाहे वह कहानीकार हो, नाटककार हो या समसामयिक विषयों पर लेख लिखने वाला हो, कवि हो या कुछ और , चाह...

सोमवार, 22 मई 2017

Laxmirangam: पुस्तक प्रकाशन

Laxmirangam: पुस्तक प्रकाशन: पुस्तक प्रकाशन हर रचनाकार , चाहे वह कहानीकार हो, नाटककार हो या समसामयिक विषयों पर लेख लिखने वाला हो, कवि हो या कुछ और , चाह...

रविवार, 21 मई 2017

चन्द माहिया :; क़िस्त 40

चन्द माहिया : क़िस्त 40

:1:
जीवन की निशानी है
रमता जोगी है
और बहता पानी है

;2:
मथुरा या काशी क्या
मन ही नहीं चमका
घट क्या ,घटवासी क्या

:3:
ख़ुद को देखा होता
मन के दरपन में
क्या सच है ,पता होता

:4:
बेताब न हो , ऎ दिल !
सोज़-ए-जिगर तो जगा
फिर जा कर उन से मिल

:5;
ये इश्क़ इबादत है
दैर-ओ-हरम दिल में
और एक ज़ियारत है



-आनन्द.पाठक-
08800927181

शब्दार्थ
सोज़-ए-जिगर = अन्त: की अग्नि

शनिवार, 13 मई 2017

एक ग़ज़ल : हौसला है दो हथेली है----



हौसला है ,दो हथेली है , हुनर है
किस लिए ख़ैरात पे तेरी नज़र है

आग दिल में है बदल दे तू ज़माना
तू अभी सोज़-ए-जिगर से बेख़बर है

साजिशें हर मोड़ पर हैं राहजन के
जिस तरफ़ से कारवाँ की रहगुज़र है

डूब कर गहराईयों से जब उबरता
तब उसे होता कहीं हासिल गुहर है

इन्क़लाबी मुठ्ठियाँ हों ,जोश हो तो
फिर न कोई राह-ए-मंज़िल पुरख़तर है

ज़िन्दगी हर वक़्त मुझको आजमाती
एक मैं हूं ,इक मिरा शौक़-ए-नज़र है

लाख शिकवा हो ,शिकायत हो,कि ’आनन’
ज़िन्दगी फिर भी हसीं है ,मोतबर है 

-आनन्द.पाठक-
08800927181
शब्दार्थ
सोज़-ए-जिगर = दिल की आग
राहजन  = लुटेरे [इसी से राहजनी बना है]
गुहर   = मोती
पुरख़तर = ख़तरों से भरा
शौक़-ए-नज़र =चाहत भरी नज़र

गुरुवार, 11 मई 2017

एक व्यंग्य गीत : मैं तेरे ब्लाग पे आऊँ-----


एक व्यंग्य गीत : मैं तेरे ’ब्लाग’ पे आऊँ------

[संभावित आहत जनों से क्षमा याचना सहित]-----

मैं तेरे ’ब्लाग’ पे जाऊँ ,तू मेरे ’ब्लाग’ पे आ
मैं तेरी पीठ खुजाऊँ  , तू मेरी  पीठ  खुजा

तू क्या लिखता रहता है , ये  बात ख़ुदा ही जाने
मैने तुमको माना है  , दुनिया  माने ना माने
तू इक ’अज़ीम शायर’ है ,मैं इक ’सशक्त हस्ताक्षर
यह बात अलग है ,भ्राते ! हमको न कोई पहचाने

मैं तेरी नाक बचाऊँ ,तू मेरी नाक बचा
मैं तेरा नाम सुझाऊँ , तू मेरा नाम सुझा

कभी ’फ़ेसबुक’ पे लिख्खा जो तूने काव्य मसाला
याद आए मुझको तत्क्षण ,’दिनकर जी’-पंत-निराला
पहले भी नहीं समझा था , अब भी न समझ पाता हूँ
पर बिना पढ़े ही ’लाइक’ औ’ ’वाह’ वाह’ कर डाला

तू ’वाह’ वाह’ का प्यासा ,तू  मुझको ’दाद’ दिला
मैं तेरी प्यास बुझाऊँ , तू मेरी प्यास बुझा

कुछ खर्चा-पानी का ’जुगाड़’ तू कर ले अगर कहीं से
कुछ ’पेन्शन फंड’ लगा दे या ले ले   ’माहज़बीं’ से
हर मोड़ गली  नुक्कड़ पे  हैं हिन्दी की  ’संस्थाएँ ’
तेरा ’सम्मान’ करा दूँ ,तू कह दे , जहाँ  वहीं   से

तू  बिना हुए ’सम्मानित’ -जग से  न कहीं उठ  जा
मैं तुझ को ’शाल’ उढ़ाऊँ , तू  मुझ को ’शाल उढ़ा

कुछ हिन्दी के सेवक हैं जो शिद्दत से लिखते हैं
कुछ ’काँव’ ’काँव’ करते हैं ,कुछ ’फ़ोटू’ में दिखते हैं
कुछ सचमुच ’काव्य रसिक’ हैं कुछ सतत साधनारत हैं
कुछ को ’कचरा’ दिखता है ,कुछ कचरा-सा बिकते हैं

मैं ’कचड़ा’ इधर बिखेरूँ , तू ’कचड़ा’ उधर गिरा
 तेरी  ’जयकार ’ करूँ मैं  - तू मेरी ’जय ’  करा

[आहतजन का  संगठित और समवेत स्वर में
’आनन’ के ख़िलाफ़ --उद्गार----]

बड़ ज्ञानी  बने है फिरता -’आनन’ शायर का बच्चा
कुछ ’अल्लम-गल्लम’ लिखता- लिखने में अभी है कच्चा
’तुकबन्दी’ इधर उधर से बस ग़ज़ल समझने लगता
अपने को ’मीर’ समझता ,’ग़ालिब’ का लगता चच्चा 

इस ’तीसमार’ ’शेख चिल्ली’ की कर दें खाट खड़ी 
सब मिल कर ’आनन’ को इस ’ग्रुप’ से दें धकिया

-आनन्द.पाठक-
08800927181

[नोट- माहजबीं--हर शायर की एक ’माहजबीं’ और हर कवि की एक  ’चन्द्रमुखी’ होती है -
सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करते  और मैं ? न मैं शायर हूँ ,न कवि -----हा हा हा ----]

सोमवार, 8 मई 2017

Laxmirangam: एक पुस्तक की प्रूफ रीडिंग

Laxmirangam: एक पुस्तक की प्रूफ रीडिंग: एक पुस्तक की प्रूफ रीडिंग सबसे पहली बात: “ प्रूफ रीडर का काम पुस्तक में परिवर्तन करना नहीं है , केवल सुझाव देने हैं कि पुस्तक...

चन्द माहिए : क़िस्त 38

चन्द माहिया : क़िस्त 38
:1:

 उनका हूँ दीवाना
देख रहें ऐसे
जैसे मैं  बेगाना

:2:
कोरी न चुनरिया है
कैसे मैं आऊँ ?
खाली भी गगरिया है

;3:
कुछ भी तो नही लेती
ख़ुशबू ,गुलशन से
फूलों का पता देती

:4:
दुनिया का मेला है
सब तो अपने ही
दिल फिर भी अकेला है

:5:
मुझको अनजाने में
लोग पढ़ेंगे कल
तेरे अफ़साने में

-आनन्द.पाठक-
08800927181

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

चन्द माहिया: क़िस्त 39 [अहवाल-ए-कश्मीर पर]

चन्द माहिया : क़िस्त 39 [ अहवाल-ए-कश्मीर पर]


:1:
वो ख़्वाब दिखाते हैं
जन्नत की ख़ातिर
जन्नत ही जलाते हैं

:2;
नफ़रत ,शोले ,फ़ित्ने
बस्ती जली किस की
रोटी सेंकी ,किसने ?

:3:
ये कैसी सियासत है ?
धुन्ध ,धुँआ केवल
ये किस की विरासत है?

;4:
रहबर बन कर आते
कलम छुड़ा तुम से
पत्थर हैं चलवाते 

;5:
केसर की क्यारी में
ज़हर उगाने की
वो हैं तैय्यारी में 

-आनन्द.पाठक-
08800927181


गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

“अरविंद केजरीवाल जी, कृपया मतदाताओं का अपमान न करें”.
दिल्ली में सत्ता पाने के समय से ‘आप’ दल के नेताओं का जैसा व्यवहार रहा है, उसे देख कर यह अनुमान लगाया जा सकता था कि दिल्ली एमसीडी चुनावों में पार्टी की हार के लिए वह किसी न किसी को दोषी करार दे देंगे. संविधानिक संस्थाओं और परम्पराओं का सम्मान करने का चलन उनके दल में नहीं है ऐसा हम सब ने देखा ही है. वह उसी नियम-कानून के मानने को तैयार हैं जो उनकी समझ में सही है, भ्रष्टाचार की उनकी अपनी परिभाषा है. ऐसे में उनसे अपेक्षा करना कि जनता के निर्णय का सम्मान करते हुए वह इस निर्णय को विनम्रता से स्वीकार कर लेंगे गलत होगा.  
चुनाव के नतीजे आने से पहले ही ‘आप’ के नेता जैसी  बोली बोल रहे थे वह अपेक्षित ही थी. उनके किसी नेता ने कहा कि अगर उनकी पार्टी की जीत होगी तो यह जनता का निर्णय होगा पर अगर बीजेपी की जीत होती है तो यह ईवीएम् मशीनों के कारण होगी.
आज यही राग उनके नेता आलाप रहे हैं. ऐसा करके वह उन सब मतदाताओं का अपमान कर रहे हैं जिनका लोकतंत्र में पूरा विश्वास है, जिन्होंने मतदान में भाग लिया. समय-समय पर चुनाव हारे हुए नेता ऐसा राग अलापते रहे हैं. बीजेपी के नेताओं ने भी ऐसी बातें कहीं हैं. पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस के नेता भी ऐसी बातें कहने लगें हैं, हालांकि कांग्रेस के राज में ही इन मशीनों का प्रयोग आरम्भ हुआ था.  
पर जितने भी नेताओं ने (या उनके प्रतिनिधियों ने) ईवीएम् मशीनों को लेकर प्रश्न उठायें हैं उन में से आजतक एक भी व्यक्ति कोई ऐसा प्रमाण नहीं दे पाया जिससे यह प्रमाणित हो कि ईवीएम् मशीनों के साथ छेड़छाड़ हुई थी.
और एक बात सोचने वाली है कि जनता तो जानती है कि उन्होंने किसे वोट दिए हैं. आज तक देश की किसी भाग में मतदातों ने चुनावों की सत्यता या प्रमाणिकता पर प्रश्न नहीं उठायें हैं. कहीं कोई आंदोलन नहीं हुआ, कहीं भी लोगों ने यह बात नहीं उठायी कि ईवीएम् मशीनों का गलत इस्तेमाल हुआ है. अगर ईवीएम् मशीनों को इतने बड़े पैमाने पर दुरुपयोग संभव होता तो क्या कोई सत्ताधारी पार्टी चुनाव हारती? क्या मोदी जी तीन बार गुजरात में चुनाव जीत पाते? क्या दिल्ली में सत्ता परिवर्तन होता?
आज किसी टीवी पर हो रही चर्चा में ‘आप’ के नेता कह रहे थे ‘क्या कोई मुझे “समझा” सकता है वगैरह-वगैरह’.  मुझे उसकी बात सुन हंसी आई. जब ‘आप’ ने यह तय कर ही लिया है कि ‘आप’ की हार का कारण मतदाता नहीं, ईवीएम् मशीनों हैं तो ‘आप’ को कोई क्या समझा सकता है. कहावत है कि सोये को जगाया जा सकता है, जागे को कौन जगा सकता है.

अरविंद केजरीवाल जी हम नहीं जानते कि ‘आप’ की क्या मजबूरी है जो  आप सत्य को स्वीकार नहीं कर सकते. पर चुनावों में मिली करारी हार के लिए ईवीएम् मशीनों को दोष देकर मतदाताओं का  अपमान न करें. आपका संविधान में, संस्थाओं में, लोकतंत्र में विश्वास हो न हो, देश के अधिकतर लोगों का विश्वास है, उनके विश्वास का अपमान न करें, इसी में देश और समाज की भलाई है.  

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

एक युगल शिकायती गीत ---वरना क्या मैं------

FaceBook और  Whatsup के ज़माने में 
और 
U CHEAT.......U SHUT UP----UUUUUU SHUT UP के दौर में 

एक ’क्लासिकल’ युगल  शिकायती :   गीत 

कैसे कह दूँ कि अब तुम बदल सी गई
वरना क्या  मैं समझता नहीं  बात क्या !

एक पल का मिलन ,उम्र भर का सपन
रंग भरने का  करने  लगा  था जतन
कोई धूनी रमा , छोड़ कर चल गया
लकड़ियाँ कुछ हैं गीली बची कुछ अगन
कोई चाहत  बची  ही नहीं दिल में  अब
अब बिछड़ना भी  क्या ,फिर मुलाक़ात क्या !
वरना क्या मैं समझता----

यूँ जो नज़रें चुरा कर गुज़र जाते हों
सामने आने से तुम जो कतराते हो
’फ़ेसबुक’ पर की ’चैटिंग’ सुबह-शाम की
’आफ़-लाइन’- मुझे देख हो जाते हो
क्यूँ न कह दूँ कि तुम भी बदल से गए
वरना क्या मैं समझती नहीं राज़ क्या !

ये सुबह की हवा खुशबुओं से भरी
जो इधर आ गई याद आई तेरी
वो समय जाने कैसे कहाँ खो गया
नीली आंखों की तेरी वो जादूगरी
उम्र बढ़ती गई दिल वहीं रह गया
ज़िन्दगी से करूँ अब सवालात क्या !
वरना क्या मैं समझता नहीं-------

ये सही है कि होती हैं मज़बूरियाँ
मन में दूरी न हो तो नहीं  दूरियाँ
यूँ निगाहें अगर फेर लेते न तुम
कुछ तो मुझ में भी दिखती तुम्हें ख़ूबियाँ
तुमने समझा  मुझे ही नहींआजतक
ना ही समझोगे होती है जज्बात क्या !
वरना क्या मैं समझती नहीं--------

-आनन्द.पाठक-
088927181

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

चन्द माहिया : क़िस्त 37

चन्द माहिया : क़िस्त 37


:1:
सद ख़्वाब ,ख़यालों में
जब तक  है परदा
उलझा हूँ सवालों में 

;2:
शिकवा  न शिकायत है
मैं ही ग़लत ठहरा
ये कैसी रवायत है

:3:
तुम ने ही बनाया है 
ख़ाक से जब मुझ को 
फिर ऎब क्यूँ आया है ?

:4:
सच है इनकार नहीं
’तूर’ पे आए ,वो
लेकिन दीदार नहीं 

:5;

कहता है कहने दो
बात ज़हादत की
ज़ाहिद तक रहने दो

-आनन्द.पाठक-
08800927181

शब्दार्थ
ज़हादत की बातें  = जप-तप की बातें
तूर = उस पहाड़ का नाम जहाँ पर हज़रत
मूसा ने ख़ुदा से बात की थी



सोमवार, 17 अप्रैल 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 30 [ बहर-ए-हज़ज सालिम -1]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त 30 [ बह्र-ए-हज़ज [ सालिम बह्र-1]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

फिछली क़िस्त में हमने बहर मुतक़ारिब और बहर मुतदारिक की सालिम , मुज़ाहिफ़ और इसकी  ’मुज़ाअफ़’  पर चर्चा कर चुके है । हालाँ कि उसके बाद भी  चर्चा की और भी गुंजाइश थी मगर ज़रूरी नहीं थी।
ये दोनो  बह्रें ’ख़म्मासी’ [5- हर्फ़ी] कहलाती है कारण कि इन की जो बुनियादी रुक्न ’फ़ऊलुन’ [122] और ’फ़ाइलुन’ [ 212] हैं वो 5- हर्फ़ी हैं यानी [ --फ़े--अलिफ़--ऐन--लाम--नून] से बनी है
अब हम बह्र-ए-हज़ज की चर्चा करेंगे । यह बह्र सुबाई बहर[7-हर्फ़ी] कहलाती है यानी इनके रिक्न में 7-हर्फ़ का वज़न होता है
इस बहर का बुनियादी रुक्न है --मुफ़ाईलुन [1 2 2 2] यानी [ --मीम --फ़े--अलिफ़---ऐन--ये--लाम ---नून]
यह बहर एक बतद [3 हर्फ़ी] और 2 सबब [2-हर्फ़ी] से मिलकर बना है

मुफ़ाईलुन [ 1222] = वतद+सबब+सबब
   = यानी वतद-ए-मज़्मुआ+ सबब-ए-ख़फ़ीफ़+सबब-ए-ख़फ़ीफ़
    मुफ़ा [1 2]                   + ई [2}                + लुन  [2]  
   =   1 2 2 2 = मुफ़ाईलुन

 आज हज़ज के सालिम बहर की चर्चा करेंगे । सालिम क्यों कहते है अब बताने की ज़रूरत नहीं है शायद। इस बहर में सिर्फ़  सालिम रुक्न  ’मुफ़ाईलुन’ का ही प्रयोग करेंगे कोई ज़िहाफ़ का प्रयोग नहीं करेंगे
[क] बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: सालिम
मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन  [दो बार]
  1 2 2 2------1 2 2 2
यानी यह रुक्न अगर  किसी शे’र में 4-बार या मिसरा में 2-बार] प्रयुक्त हो तो उसे मुरब्ब: सालिम कहेंगे [ मुरब्ब: मानी ही 4-होता है]
एक ख़ुद साख़्ता [खुद की बनाई हुई] शे’र सुनाते हैं [पसन्द न आए कोई बात नहीं मयार भले न हों वज़न तो है ---हा हा हा ]

चले आओ मिरे दिल में
फ़ँसी है जान  मुश्किल में 

तक़्तीअ कर के देखते हैं
1  2   2  2  / 1  2  2  2 =1222--1222
चले आओ / मिरे दिल में
             1  2   2  2 / 1  2  2   2 =1222---1222
फ़ँसी है जा /न  मुश् किल में

 एक दूसरा शे’र भी सुन लें [कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब के हवाले से ]

कभी इक़रार की बाते
कभी इनकार की बातें
तक़्तीअ कर के देखते है
1 2   2   2   / 1  2  2  2 = 1222--1222
कभी इक़ रा /र की बाते
            1   2    2   2 / 1  2  2 2 =1222---1222
कभी इन का /र की बातें
जब तक अगली बहर पर जायें -एक खेल खलते हैं [ गुस्ताखी मुआफ़ी के तहत]
सिद्द्क़ी साहब के शे’र को आगे बढ़ाते हुए और अपने कलाम का पेबन्द लगाते हुए

कभी इक़रार की बातें
कभी इनकार की बातें

चले आओ मिरे दिल में 
नहीं कटती हैं अब रातें
[तक़्तीअ आप कर लीजियेगा] इसी तरह आप भी चन्द अश’आर [ क़ाफ़िया बरक़रार रखते हुए] जोड़ सकते हैं --मश्क़ [ प्रैक्टिस] भी हो जायेगी] ख़याल रखियेगा --- ’बातें ’ का क़फ़िया --गाते--- आते---जाते---खाते---नहीं होगा -कारण कि इन में हर्फ़ उल आखिर [आखिरी हर्फ़] में ;नून गुन्ना’ नहीं होगा।  सौगातें---मुलाक़ातें चलेगा। ख़ैर--
एक बात और--
मुरब्ब: बहर में सिर्फ़ सदर/इब्तिदा---अरूज़/जर्ब ही होता है। हस्व का मुक़ाम नहीं होता । होगा भी कैसे? एक मिसरा में 2-रुक्न है --तो जगह ही कहाँ बचा ’हस्व’ के लिए  ?

वैसे सालिम बहर में ग़ज़ल कहना आसान होता है - ज़िहाफ़ से मुक्त  होता है -- ज़िहाफ़ात की कोई झंझ्ट ही नहीं

[ख] बहर-ए-हज़ज मुसद्दस सालिम
    मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन
     1222--------1222---------1222
यानी एक मिसरा में 3-सालिम रुक्न या शे’र में 6-रुक्न] मुसद्दस मानी ही 6
[जनाब आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से]

मआल-ए-इश्क़ ख़जलत के सिवा क्या है
कहो सब से न कोई दिल लगाये याँ

अब इसकी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
1  2  2   2 / 1     2    2    2  / 1 2  2   2   = 1222---1222---1222
मआले इश्/ क़  ख़ज लत के/ सिवा क्या है
1   2   2   2  / 1   2 2  2    / 1  2 2  2    = 1222----1222--1222
कहो सब से/  न को ई दिल /  लगाये याँ

इस बहर की ’मुज़ाअफ़’ शकल भी मुमकिन है। उदाहरण आप बताएं तो अच्छा होगा अभी तक मेरे ज़ेर-ए-नज़र गुज़रा नहीं । कभी कहीं मिलेगा तो यहाँ लगा देंगे।

[ग] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम   यह वज़न  ही बहुत  मक़्बूल मानूस और मारूफ़ वज़न है  अमूमन हर शायर ने इस बहर में अपनी ग़ज़ल /अश’आर कहें है और कसरत [ प्राचुर्य, अधिकता से,बहुतायत ] से कहें हैं और कसरत से उदाहरण दस्तयाब [प्राप्य ] हैं
इसका वज़न है

    मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन
     1222--------1222---------1222-------1222
यानी सालिम रुक्न -मुफ़ाईलुन- मिसरा में 4-बार और शे’र मे 8-बार आता है । मुसम्मन मानी 8
अल्लामा इक़बाल की एक नज़्म है

जिन्हें मैं ढूँढता था आसमानों ज़मीनो में 
वो निकलें मेरे ज़ुल्मतखाना-ए-दिल के मक़ीनों में

ख़मोश ऎ दिल ! भरी महफ़िल में चिल्लाना नहीं अच्छा
अदब पहला क़रीना है मुहब्बत के क़रीनों  में

 एक शे’र की तक़्तीअ मैं कर देता हूँ ---एक की आप कर दें
1  2   2      2    / 1  2  2   2      / 1   2  2   2   / 1 2  2  2 =1222---1222---1222---1222 [यहाँ ख़मोश ए दिल --में ==ऐ - श के साथ वस्ल होकर ’शे’ का तलफ़्फ़ुज़ दे रहा है सो 2 का वज़न लिया
ख़मोश ऎ दिल /! भरी मह फ़िल /में चिल ला ना /न हीं अच् छा
1  2     2    2  / 1 2  2  2/ 1  2  2   2   / 1 2 2  2 = 1222---1222---1222---1222
अ दब पह ला /क़रीना है /मु हब बत के / क़रीनों  में

पहले शे’र की तक़्तीअ आप कर के मुतमय्यिन [निश्चिन्त] हो लें

अब एक मीर का एक शे’र लेते है

कभू ’मीर’ इस तरफ़ आकर जो छाती कूट जाता है
ख़ुदा शाहिद है , अपना तो  कलेजा टूट जाता  है

[ मीर -का यह ख़ास अन्दाज़ था -कभी-को -कभू -लिखना । वज़न में वैसे भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा]

इसकी तक़्तीअ भी कर के देख लेते है
1  2    2    2     / 1   2   2  2      / 1  2  2  2  / 1 2 2 2 = 1222----1222----1222----1222
कभू ’मीर’ इ स/  त रफ़ आ कर /जो छाती कू/ट जा ता है
1  2    2   2    / 1   2   2   2  / 1 2 2 2  / 1 2 2  2 =1222-----1222----1222---1222-
ख़ुदा शा हिद /है , अप ना तो / कलेजा टू /ट जा ता  है

[यहां ’मीर इस’ को 2 2 की वज़न पर क्यों लिया -एक खटका सा लगा होगा आप को। कारण कि मीर के ’र ’ के साथ सामने जो ’इस’ वस्ल हो कर    ---’मी रीस’-- का तलफ़्फ़ुज़ दे रहा है और यह 2- सबब है[सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है]
यानी -कभू -12 -वतद-ए-मज़्मुआ -मुफ़ा [12] के वज़न पर
मी  [2]  सबब-ए-ख़फ़ीफ़ -ई-[2] के वज़न पर
रिस [2] सबब-ए-ख़फ़ीफ़ -लुन-[2] के वज़न पर

अब एक शे’र ग़ालिब का भी देख लेते हैं

न था कुछ तो ख़ुदा था ,कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने ,न होता मैं तो क्या  होता

हुई मुद्दत कि ’ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है
वो इक हर बात पर कहना कि यों होता तो क्या होता

[यहाँ एक बात वाज़ेह [स्प्ष्ट] कर दें अगर आप मतला समझ गये होंगे  तो ज़िन्दगी के दर्शन भी समझ गए होंगे ।इस मतला का कोई सानी नहीं ,खुदा मग़फ़रत करें]

चलिए एक शे’र की तक़्तीअ मैं कर देता हूँ मतला की आप कर लें
1  2   2   2  / 1    2  2     2   / 1 2  2   2    / 12 2 2 = 1222---1222---1222---1222
हुई मुद् दत / कि ’ग़ालिब’ मर/ ग या पर या /द आता है
1   2    2   2   /  1 2   2  2   / 1   2   2  2 / 1 2    2 2 == 1222---1222---1222---1222
वो इक हर बा /त पर कहना  /कि यों होता /तो क्या होता
तो यह होते हैं मुस्तनद शो"अरा [प्रामाणिक और उस्ताद शायरों] के कलाम -- ऐब से पाक ,मयार में बुलन्द. तवाज़ुन में एक भी मज़ीद  ’हर्फ़’[ अतिरिक्त हर्फ़ ]की गुंजाईश  नहीं ----हमारे जैसे ग़रीब को तो बहुत और  बहुत कुछ सीखने के ज़रूरत है
उदाहरण तो बहुत है अज़ीम शो’अरा के है

अब चलते चलते एक शे’र इस हक़ीर का भी बर्दास्त कर ले[मेहरबानी होगी]

जो जागे हैं मगर जगते  नहीं उनको जगाना क्या
खुदी को ख़ुद जगाना है किसी के पास जाना क्या

इबारत है लिखी दीवार पर गर पढ़ सको ’आनन’
समझ जाओ इशारा क्या ,नताइज़ को बताना क्या

पहले शे’र की तक़्तीअ कर के देखते हैं--मतला की आप कर लें-आसान है
1   2  2  2/  1 2  2  2    / 1  2  2    2  / 1 2 2 2 =1222--1222--1222--1222
जो जागे हैं / म गर जगते  /नहीं उनको /जगाना क्या
1  2    2    2  / 1 2  2 2 / 12 2   2    / 1 2 2 2 =1222---1222----1222--1222
खुदी को ख़ुद/ जगाना है /किसी के पा /स जाना क्या

चलते चलते एक खूब सूरत दिलकश गाना सुनाते है --आप ने सुना भी होगा --यू ट्यूब- पर उपलब्ध है गीतकार राजेन्द्र कृष्ण जी है
फ़िल्म ’शहनाई’ [1964] का है जिसको  विश्व जीत और राजश्री पर फ़िल्माया गया है ।लिन्क नीचे लगा दिया हूँ आप भी सुने
https://www.youtube.com/watch?v=W_YckCpQAoY
गाने की इबारत लिख रहा हूँ

न झटको जुल्फ़ से पानी ,ये मोती फूट जायेंगे
तुम्हारा कुछ न बिगड़ेगा ,मगर दिल टूट जायेंगे

ये भींगी रात ये भींगा बदन ये हुस्न का आलम
ये सब अन्दाज़ मिल कर दो जहाँ को लूट जायेंगे

हमारी जान ले लेगा ,ये नीली आँख का जादू
चलो अच्छा हुआ मर कर जहाँ से छूट जायेंगे

ये नाज़ुक लब है या आपस में दो लिपटी हुई कलियाँ
ज़रा इनको अलग कर दो तरन्नुम फूट जायेंगे  
   
अब 1-2 शे’र की तक़्तीअ कर के देखते है बाक़ी का आप कर के तस्दीक कर लें
  1  2   2   2   / 1  2  2  2  / 1  2  2  2/ 1  2 2 2 1222-1222-1222-1222
न झटको जुल् /फ़ से पानी / ,ये मोती फू /ट जायेंगे
1   2  2   2   / 1  2   2   2  /  1 2    2    2  / 1  2 2 2 1222--1222-1222-1222
तुम्हारा कुछ / न बिग ड़े गा ,/ म गर दिल टू /ट जायेंगे
1    2  2 2 /1 2 2  2   / 1 2  2  2    / 1 2   2  2 1222-1222-1222-1222
ये भींगी रा/ त ये भींगा  /बदन ये हुस् / न का आलम
1   2    2    2   / 1  2     2   2   / 1  2  2  2  /1  2 2 2 1222-1222-1222-1222
ये सब अन् दा / ज  मिल कर दो /जहाँ को लू /ट जायेंगे

अरे ! यह तो बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम की बहर आ गई। तो क्या यह गाना हज़ज मुसम्मन सालिम में लिखा गया है } जी हां

गाना लिख कर उदाहरण देने का मेरा मक़सद यही रहता है कि आप बहर/वज़न की ताक़त को पहचाने,  कितनी तर्न्नुम होती हैं ये बह्रें ,,,,कितनी दिल कश मौसिकी [संगीत] लय तान धुन सुर आरोह अवरोह से बाँधी जा सकती हैं ये ग़ज़लें । पुरानी पीढ़ी के गीतकार .शायर कितना पास [ख़याल] रखते थे अपनी शायरी में । ऊपर के शे’र मे एक भी हर्फ़ न ज़्यादा हुआ न कम हुआ-क्या ग़ज़ल कही है हर वज़न हर शे’र अपनी जगह मुकम्मल । यही कारण है कि ग़ज़ल लिखना आसान भले हो कहना आसान नहीं
आज के फ़िल्मी गीतों की क्या बात करे ---चार बोतल वोडका---काम है मेरा रोज़ का---हो गया गाना । अल्ला अल्ला ख़ैर सल्ला--भगवान ही मालिक है।
एक बात और
एक बात मेरे ज़ेहन में आ रही है ,आप के ज़ेहन में भी आ रही होगी?
 मुतक़ारिब और मुतदारिक के केस में  मुज़ाअफ़ [ 16-रुक्नी] बहर का ज़िक़्र किया था मगर अरूज़ की किताबों में बहर-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम मुज़ाअफ़ का कहीं ज़िक़्र नही देखा और न कोई मिसाल [उदाहरण] ही देखी? न जाने क्यों ? पता नही? इस सवाल का जवाब तो कोई मुस्तनद व मारूफ़ अरूज़ी [प्रमाणित व प्रतिष्ठित ] ही दे सकते हैं आप में से भी शायद कोई दे सकता है। मैं तो नहीं दे सकता ,मेरी  बिसात कहाँ ।

हाँ लाल बुझक्कड़ की तरह कुछ बूझ सकता हूं सही भी हो सकता है ग़लत भी हो सकता है कॄपा कर के इसको प्रमाणिक नहीं मानियेगा } मैं तो ऐसे ही सोच रहा हूँ

मुतक़ारिब या मुतदारिक बहरें ख़म्मसी बहरें [5-हर्फ़ी]बहरें थी अगर इनकी ’मुसम्मन मुज़ाअ’फ़ बहर बनती है
तो  कुल मात्रा  122----122------------------122-  =   5 गुना 8 =40 हर्फ़
या 212---212-------------------------------212-=   5 गुना 8 = 40 हर्फ़

मगर जब सुबाई बह्रे [हज़ज------रमल----रजज़ ] की मुसम्मन मुज़ाअफ़ बनेगी तो क्या होगा  =56 हर्फ़ आ जायेंगे
इतनी लम्बी बहर क्या मौसिकी [संगीत] सपोर्ट कर पायेगी या नहीं ? मालूम नहीं?
मगर हाँ --जिस गज़ल को संगीत बद्ध या लय पूर्ण गाया न जा सके तो फिर वो ग़ज़ल क्या है । ’दाग़’ की ग़ज़लें कोठेवालियाँ यूँ ही तो नहीं गाती थी !

प की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

अब अगले क़िस्त में बहर-ए-हज़ज के मुज़ाहिफ़ बह्रों पे चर्चा करेंगे 
अस्तु
--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

www.urdu-se-hindi.blogspot.com
or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-
0880092 7181