मित्रों!

आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।


फ़ॉलोअर

गुरुवार, 9 जून 2016

एक ग़ज़ल : सपनों में लोकपाल था.....

एक ग़ैर रवायती ग़ज़ल



सपनों में ’लोकपाल’ था  मुठ्ठी में इन्क़लाब
’दिल्ली’ में जा के ’आप’ को क्या हो गया जनाब !

वादे किए थे आप ने ,जुमलों का क्या हुआ
अपने का छोड़ और का लेने लगे हिसाब  ?

कुछ आँकड़ों में ’आप, को जन्नत दिखाई दी
गुफ़्तार ’आप’ की हुआ करती  है लाजवाब

लौटे हैं हाथ में लिए बुझते हुए  चराग
निकले थे घर से लोग जो लाने को माहताब

चढ़ती नहीं है काठ की हांडी ये बार बार
कीचड़ उछालने से ही  होंगे न कामयाब

जो बात इब्तिदा में थी अब वो नहीं रही
वो धार अब नहीं है ,न तेवर ,न आब-ओ-ताब

गुमराह हो गया है  मेरा मीर-ए-कारवां
’आनन’ दिखा रहा है वो फिर भी हसीन ख़्वाब

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शब्दार्थ
आप [A.A.P]   =Noun or pronoun जो आप समझ लें
गुफ़्तार = बातचीत
मीर-ए-कारवाँ  = कारवां का नेतृत्व करने वाला


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें